मानसून के आगाज के साथ ही गंगा के किनारे बसे किसानों के लिए कटान का भय
सताने लगा है। पहले भी कई गांवों के किसानों के खेत गंगा की कटान से समाप्त
हो चुके हैं।
इसके लिए उन्हें न तो मुआवजा मिला है और न ही कटान रोकने के लिए कोई उपाय किया गया है।
गंगा
के जल स्तर में बढ़ाव होते ही तटवर्ती गांव बहादुरपुर, कुंडा खुर्द,
कुंडा कला, सहजौर, मवईकला, कैली, भुपौली तथा रौना के किसानों धडकनें बढ़
जाती हैं क्योंकि इन गांवों में कटान की जटिल समस्या उत्पन्न हो गई है।
पिछले वर्ष बहादुरपुर से सहजौर तक सर्वाधिक कटान की समस्या आई थी।
डीएम ने
मौके पर पहुंच कर निरीक्षण भी किया था और सहायता का आश्वासन दिया था लेकिन
आज तक कार्रवाई नहीं हुई। चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों के नेताओं ने भी
गंगा के तटवर्ती गांवों में पहुंच कर राहत के लिए आश्वस्त किया था लेकिन
उनके आश्वासन थोथे हो गए हैं।
बहादुरपुर के एनुद्दीन ने बताया कि उसके पास
सात बीघा भूमि थी, इसमें से तीन बीघा गंगा में समा गई। बची भूमि भी इस
वर्ष गंगा में समा सकती उन्हें इसका डर खए जा रहा है। तब वे भूमिहीन हो
जाएंगे।
वे कहां जाएं और किससे अपना दुखड़ा रोएं। मुआवजा के लिए
अधिकरियों ने आश्वासन दिया मगर अभी तक हाथ कुछ नहीं लगा। कुंडा कला निवासी
सुबेदार की पीड़ा भी कुछ ऐसी ही है। अपनी भूमि को बचाने के लिए वे भी
असहाय हैं।
लालता प्रजापति एवं मलोखर निवासी पूर्व प्रधानपति दयाराम
यादव का कहना है कि आपदा के समय नेता व अधिकारी दानों इससे राहत दिलाने की
बात करते हैं पर बाद में कोई आगे नहीं आता।