कंदवा। कर्मनाशा की हार हो या साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कृति नीला चांद, डॉ. शिव प्रसाद सिंह ने अपनी रचनाओं में पारंपरिक और आधुनिकता का जैसा सामंजस्य प्रस्तुत किया है, वह दुर्लभ है।
नरवन परगना के जलालपुर (पूर्वी) गांव में 19 अगस्त 1929 को जन्मे शिव प्रसाद सिंह करीब 10 मील का सफर पैदल तय कर बरहनी पढ़ने जाते थे। इसके बाद उन्होंने उदय प्रताप काॅलेज वाराणसी से इंटरमीडिएट और आगे की पढ़ाई बीएचयू से की। एमए में ही उन्होंने कीर्तिलता और अवहट्ठ पर जो लघु शोध प्रबंध प्रस्तुत किया, उसकी सराहना पं. राहुल सांकृत्यायन और डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे मूर्धन्य विद्वानों ने की। डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी के निर्देशन में उन्होंने सूर पूर्व ब्रजभाषा और उसका साहित्य विषय पर शोध किया और अध्यापन में जुट गए। वह काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के अध्यक्ष और रेलवे बोर्ड के राजभाषा विभाग के मानद सदस्य भी रहे। 28 सितंबर 1998 को वाराणसी में उनका निधन हो गया।
डॉ. शिवप्रसाद सिंह की दादी मां, कर्मनाशा की हार, धतूरे का फूल, नन्हों, एक यात्रा सतह के नीचे, राग गूजरी, मुरदा सराय जैसी रचनाएं की हैं। अलग-अलग वैतरिणी और गली आगे मुड़ती है उनकी चर्चित कृतियां हैं। नीला चांद, कोहरे में युद्ध, दिल्ली दूर है, शैलूष और वैश्वानर के लेखन से पहले उन्होंने वैदिक साहित्य खंगाल डाला था। औरत, कुहरे में युद्ध आदि रचनाएं काफी मशहूर हुईं। उनकी कृति मंजूश्रिमा हिंदी की पहली शोक कथा थी।