जिले में पर्यटन के सबसे बड़े केंद्र चंद्रकांता किला पर पिछले 20 वर्षों से ताला लगा हुआ है, लेकिन वीवीआईपी के लिए ताला खोलकर उन्हें किले का भ्रमण कराया जाता है। उसकी छत पर वन विभाग ने अपना गेस्ट हाउस बना दिया है, जिसमें आमलोगों को प्रवेश वर्जित है।
नौगढ़ वनांचल क्षेत्र में स्थित चंद्रकांता किला आज अपनी पहचान और अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है। यह वही किला है, जो कभी विजयगढ़ की राजकुमारी चंद्रकांता और नौगढ़ के राजकुमार वीरेंद्र विक्रम सिंह की प्रेमगाथा का साक्षी रहा।
आज यह ऐतिहासिक धरोहर मिट्टी में दफन होती जा रही है, और उसके साथ ही दफन हो रही है एक अमर प्रेम कहानी, एक रहस्य, और एक विरासत। वर्तमान में वन विभाग की देखरेख में यह किला एक गेस्ट हाउस में तब्दील हो चुका है।
वन विश्राम गृह में अधिकारी ठहरते हैं, लेकिन आम जनता और पर्यटकों के लिए यह स्थल बंद रहता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाए, तो न केवल क्षेत्र में रोजगार बढ़ेगा, बल्कि यह किला देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित कर सकता है।
-
किले के भीतर दिखाई देती है एक सुरंग
किले के भीतर आज भी एक सुरंग दिखाई देती है, जिसके बारे में मान्यता है कि यह विजयगढ़ किले तक जाती है। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि इस किले के नीचे एक और रहस्यमयी किला मौजूद है। किले के आसपास धातु, खनिज और भट्ठियों के अवशेष पाए गए हैं, जो इसके ऐतिहासिक महत्व को और भी गहरा करते हैं।
चंद्रकांता संतति में जीवंत
हिंदी साहित्य के महान उपन्यासकार देवकीनंदन खत्री ने इस प्रेमगाथा को अपने उपन्यास चंद्रकांता और चंद्रकांता संतति में जीवंत किया। यह उपन्यास इतना लोकप्रिय हुआ कि लोगों ने इसे पढ़ने के लिए हिंदी सीखी। बाद में नीरजा गुलेरी ने इसे टीवी धारावाहिक के रूप में प्रस्तुत किया, जिसने इसे जन-जन तक पहुंचाया। देवकीनंदन खत्री के काशी नरेश ईश्वरीप्रसाद नारायण सिंह से अच्छे संबंध थे। उन्होंने चकिया और नौगढ़ के जंगलों के ठेके लिए। जंगली, पहाड़ियों और ऐतिहासिक इमारतों और लोक कथाओं के आधार पर उन्होंने चंद्रकांता की तिलस्मी दुनिया का सृजन किया।
कर्मनाशा के किनारे है मनोरम दृश्य
कर्मनाशा नदी के किनारे स्थित यह किला अब भी एक मनोरम दृश्य प्रस्तुत करता है। इसके आसपास पुराने आम, पीपल और बरगद के वृक्ष मौजूद हैं। किले की दीवारों की मरम्मत और पुताई की गई है, लेकिन इसकी मूल संरचना और ऐतिहासिकता को संरक्षित करने की आवश्यकता है। लोगों ने कई बार प्रशासन से मांग की है कि इस किले को पर्यटन स्थल घोषित किया जाए, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। किले तक पहुंचने वाला मार्ग भी क्षतिग्रस्त है, जिससे सैलानियों को भारी परेशानी होती है।
यह क्षेत्र कभी बनारस स्टेट की आखिरी सीमा थी, यहां राजपरिवार का आगमन हुआ करता था। इसे बाद में वन विभाग को सौंप दिया गया। छत पर गेस्ट हाउस बनाकर उसकी सुरक्षा सुनिश्चित की गई है। -संजय कुमार श्रीवास्तव, रेंजर, नौगढ़, चंदौली।