गांव स्थित प्राचीन मां काली की महिमा अपरंपार है। अटूट श्रद्धा और विश्वास के साथ जो भी मां के दरबार में आया वह खाली हाथ वापस नहीं लौटा।
वैसे तो हर रोज मां के दर्शन-पूजन के लिए दूरदराज से लोग आते हैं, किंतु वासंतिक एवं शारदीय नवरात्र में भक्तों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हो जाती है। हर वर्ष चैत्र रामनवमी के दिन मां का वार्ष्क शृंगार होता है जिसके तहत अपराह्न हवन-पूजन एवं रात में नाच गाने का प्रोग्राम होता है।
ऐसी मान्यता है कि मां घुघरूओं की झंकार पर ही प्रसन्न होती हैं।
गांव के लोगों का मानना है कि जब कभी भी गांव के ऊपर कोई विपत्ति की स्थिति कायम हुई है उस समय मां गांव के लोगों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रही हैं।
दैविक, दैहिक एवं भौतिक संत्राप्त से ग्रसित कोई भी व्यक्ति यदि मां के दरबार में आया तो बाधा से उसे तत्काल मुक्ति मिल जाती है। चैत्र मास रामनवमी के दिन मनाए जाने वाले मां के वार्षिक शृंगार के मद्देनजर इनदिनों मंदिर की साफ-सफाई एवं रंगरोगन का कार्य निर्बाध गति से चल रहा है।
गांव के सभी वर्गों के लोगों के आर्थिक सहयोग से मंदिर के पूजापाठ के साथ हवन पूजन का कार्य भी किया जाता है। मंदिर के पुजारी पंडित टुन्नू गुरु के अनुसार इस दफा मां के शृंगार समारोह को और भव्य रूप से मनाए जाने के लिए हर संभव प्रयास जारी है।