पीडीडीयू नगर। कारगिल विजय दिवस भारतीय सेना के अदम्य साहस, पराक्रम और बलिदान की अमर गाथा है। वर्ष 1999 में कारगिल की दुर्गम चोटियों पर हुए निर्णायक युद्ध ने पूरी दुनिया को भारतीय सैनिकों के शौर्य का परिचय कराया।
इस अभियान का हिस्सा रहे पीडीडीयू नगर के कसाब महाल निवासी वायुसेना से सेवानिवृत्त मोहम्मद इकबाल आबिद की आंखों में साथियों की शहादत की पीड़ा और चेहरे पर विजय का गर्व एक साथ दिखाई देता है।
आबिद बताते हैं कि 15 जून 1999 की रात करीब 12 बजे गुजरात के जामनगर स्थित पेसिव एयर डिफेंस (पीएडी) स्टेशन पर अचानक सायरन गूंज उठा।
रात के सन्नाटे में बजा यह सायरन किसी सामान्य अभ्यास का हिस्सा नहीं था। कुछ ही मिनटों में पूरा एयरबेस सक्रिय हो गया। सभी जवान अपने-अपने युद्धक दायित्वों के लिए तैयार होकर कमांडिंग ऑफिसर एसएस कार्निक के कार्यालय पहुंचे।
वहां उन्हें बताया गया कि कारगिल में पाकिस्तान समर्थित घुसपैठियों के खिलाफ निर्णायक सैन्य अभियान शुरू हो चुका है और अब हर पल महत्वपूर्ण है।
इसके बाद पूरा एयरबेस युद्धक्षेत्र में बदल गया था। आबिद बताते हैं कि जवानों ने बिना समय गंवाए 27 लड़ाकू विमान, एमआई-8 हेलीकॉप्टर, एएन-32 और डोर्नियर ट्रांसपोर्ट विमानों को मिशन के लिए तैयार करना शुरू कर दिया। सूरज निकलने से पहले ही एक के बाद एक विमान कारगिल की ओर उड़ान भरने लगे।
कोई विमान हथियार और गोला-बारूद पहुंचा रहा था तो कोई सेना की टुकड़ियों को अग्रिम मोर्चे तक ले जा रहा था। कई बार वही विमान शहीद जवानों के पार्थिव शरीर लेकर लौटते थे।
उन क्षणों को याद करते हुए आबिद भावुक हो जाते हैं। उनका कहना है कि सैनिक के लिए सबसे कठिन समय वह होता है, जब वह अपने साथी को तिरंगे में लिपटा देखता है, लेकिन अगले ही पल उसे फिर उसी जोश के साथ मिशन पर निकलना पड़ता है।
उन्होंने बताया कि कारगिल का युद्ध केवल गोलियों का नहीं बल्कि धैर्य, रणनीति और मनोबल की भी लड़ाई थी। दुर्गम पहाड़ियां, कम ऑक्सीजन, खराब मौसम और ऊंचाई पर बैठे दुश्मन के बावजूद भारतीय सेना और वायुसेना ने अद्भुत समन्वय का परिचय दिया।
भारतीय वायुसेना के सटीक हमलों ने दुश्मन की चौकियों को ध्वस्त किया और थल सेना के लिए आगे बढ़ने का रास्ता तैयार किया।
यही कारण रहा कि लगभग असंभव दिखाई देने वाली जीत भारत के नाम हुई।