चकिया। हर साल बारिश में कमी और अंधाधुंध जल दोहन के चलते हर साल जिले का भूजल स्तर नीचे गिरता जा रहा है। पर्वतीय वन क्षेत्रों सहित मैदानी क्षेत्रों में भूमिगत जलस्तर मेें लगातार गिरावट आ रही है। केंद्रीय जल आयोग की रिपोर्ट के अनुसार पर्वतीय वन क्षेत्रों में डेढ़ से तीन मीटर तक हर साल भूजल नीचे जा रहा है। वर्षा जल के संरक्षण तथा नदियों के पानी की बर्बादी को रोकने के लिए व्यापक प्रयास न होने से जलस्तर में गिरावट होती जा रही है।
केंद्रीय जल आयोग के द्वारा वर्ष 2015 में पर्वतीय वन क्षेत्रों एवं उससे सटे मैदानी क्षेत्रों के भूगर्भीय जलस्तर के परीक्षण के बाद जारी रिपोर्ट के अनुसार अपेक्षित बरसात न होने तथा निजी बोरिंग के चलते साल-दर-साल भूजल स्तर में गिरावट हो रही है। हालांकि केंद्रीय जल आयोग के अधिशासी अभियंता जे बाला कृष्णन के नेतृत्व में हुए जनपद के पर्वतीय वन क्षेत्रों में मुरारपुर, मुजफ्फरपुर तथा जयमोहनी एवं बटौवां गांवों में किए गए परीक्षण के बाद ये तथ्य सामने आए कि पर्वतीय क्षेत्रों के सैंडरांक के नीचे पानी के अथाह जल भंडार मौजूद हैं। इसके बावजूद भूमिगत जलस्तर में गिरावट हो रही है, कारण कि बारिश के पानी का संरक्षण नहीं हो पा रहा है।
जिले में पिछले साल वर्ष 350 मिलीमीटर बरसात दर्ज की गई है। जबकि वर्ष 2000 के पूर्व तक औसत बरसात का आंकड़ा 1050 मिलीमीटर प्रतिवर्ष है। इधर सात-आठ वषों में पांच से छह सौ मिलीमीटर बारिश होने से जलस्तर के रिचार्ज में बड़ी समस्या खड़ी हुई है। हालत यह है कि क्षेत्र में स्थित विशालकाय मूसाखाड़, चंद्रप्रभा तथा नौगढ़ जलाशयों मेें गर्मी के प्रथम चरण में ही पानी कमी। वही क्षेत्र में स्थित 96 छोटी-बड़ी बंधियों में भी पानी नही है। क्षेत्र में स्थित मनरेगा के सहयोग से खोदे गए तालाब, पोखरों, पर्वतीय नाले सूख चुके हैं। जिससे भूमिगत जलस्तर के रिचार्ज होने की स्थिति लगातार बदतर होती जा रही है। कर्मनाशा, चंद्रप्रभा, गड़ई नदियों का अधिकांश पानी उचित प्रबंधन न होने के कारण गंगा में चला जाता है। वही शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में रेनवाटर हार्वेस्टिंग के प्रति भी जनता उदासीन है। जिससे भूमिगत जलस्तर रिचार्ज नही होता है। चंद्रप्रभा प्रखंड के अधिशासी अभियंता जेपी वर्मा का कहना है कि कम बारिश के कारण भूमिगत जलस्तर रिचार्ज होने में दिक्कत आ रही है। वही खेती में सबमर्सिबल पंपों के जरिए भूमिगत जल का दोहन बढ़ गया है।