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विदुर का उपदेश सुन धृतराष्ट्र ने गृहस्थ जीवन का किया त्याग

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पीडीडीयू नगर। महाभारत में अर्जुन की उत्पत्ति धर्म, युधिष्ठिरकी वायु, भीम की अश्वनी कुमार के अंश व नकुल और सहदेव की उत्पत्ति देवताओं के अंश से हुई। कौरवों की इसी द्वेष के कारण महाभारत हुआ। विदुर की उपदेश से धृतराष्ट्र की आंखें खुल गई और उन्होंने गृहस्थ जीवन का त्याग कर भगवान को प्राप्त किया। ये बातें नगर के राम-लक्ष्मी लॉन में चल रही सात दिवसीय संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन हरिद्वार से पधारे कथावाचक विनोद सुन्द्रियाल ने कहीं।
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उन्होंने कहा कि सब कुछ यहीं छूट जाता है। इसलिए सभी को धर्म और कर्म में अधिक से अधिक भागीदारी करनी चाहिए। कलयुग ने राजा परीक्षित से जुआ खाना, मदिरालय, क्लेश, चावल और सोना धातु में अपना स्थान मांगा। इसलिए राजा परीक्षित सोने का मुकुट धारण कर धर्म के स्वरूप शमीक ऋषि के गले में मरा हुआ सांप डाल दिया। क्रोधित ऋषि ने राजा को श्राप दिया कि जिसने भी मेरे गले में सांप डाला है, वह आज से ठीक सातवें दिन मर जाएगा। यह सुनने के बाद राजा परीक्षित परिवार का त्याग कर गंगा तट पर सुखताल नामक जगह पर पहुंचे। यहां व्यास पुत्र सुखदेव जी के मुख से भागवत रूपी अमृत का रसपान कर जीवन को धन्य किया। हरिद्वार से आए चुनमुन शास्त्री ने भागवत का मूल पाठ किया और आचार्य गणेश ने कर्मकांड संपादित किया। पं. लोकपाल शर्मा ने वेद पाठ किया। कथा के दौरान महेश जायसवाल, प्रीति जायसवाल, पुरुषोत्तम सिंह, राजकुमार यादव, शिव कुमार निगम, ओमप्रकाश गुता, बृजदेव सिंह, बनारसी मौर्या, संदीप, अशोक सिद्धार्थ केसरवानी, प्रभात सिंह, अशोक जायसवाल, प्रशांत जायसवाल, अंगद जायसवाल, हरिशंकर गुप्ता, सुषमा, इंद्रा, माया, रूचि उपस्थित रहे।
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