चकिया। वसंत ऋतु के अंतिम चरण में होली का त्योहार जनमानस को उमंग, उल्लास, सद्भावना और प्रेम का संदेश देने आता है। इस संदेश को जीवंतता ऋतु गीतों में सर्वोपरि स्थान रखने वाले होली के गीत परिभाषित करते हैं। वर्तमान दौर में होली के शांति गीतों का स्थान अश्लीलता व फूहड़ता से भरे गीतों ने ले लिया है।
होली गीतों के कई आयाम लोक साहित्य की रचनाओं ने स्थापित किए हैं। होली, फाग, फगुआ, जोगीरा, कबीरा, चहका आदि इसके विविध रूप हैं। इन गीतों को ढोलक, नाल, झाल, हारमोनियम, तबला, खंजड़ी जैसे परंपरागत लोक वाद्यों के जरिए गाया जाता है। साहित्यकारों की मानें तो होली गीतों को प्रसिद्ध राग काफी में गाए जाने की परंपरा रही है। चकिया क्षेत्र में होली गीतों के अनेक लोक कवि हुए हैं। हालांकि इनमें से अधिकांश दिवंगत हो चुके हैं लेकिन उनके द्वारा रचे होली गीत आज भी होली गायकों के स्वर से मुखरित होते रहते हैं। स्वर्गीय राम स्वरूप, लाल मंगल, राम जीयावन दास बावला, राम जी मौर्य सरस आदि भले ही इस दुनिया में नहीं रहे लेकिन उनके द्वारा रचित होली गीत जन जन की जुबान पर हैं। होली गीतों के जीवित रचनाकारों में डॉ रामकिशोर शर्मा बेहद, डॉ हौसला प्रसाद द्विवेदी, राजेंद्र प्रसाद भ्रमण के गीत होली की आध्यात्मिक भावनाओं को प्रकट करते हैं। बावजूद इसके वर्तमान की पाश्चात्य संस्कृति में रचे बसे युवाओं की पसंद अश्लील होली गीत बनते जा रहे हैं। कवियों व लोक गीत गायकों द्वारा ऐसे गीत प्रचुर मात्रा में परोसे भी जा रहे हैं जो भारतीय संस्कृति की थाती होली गीतों की भावना से कोसों दूर हैं। इस अश्लीलता के कारण न केवल जनमानस पतन की ओर अग्रसर है बल्कि सांस्कृतिक परंपराओं को भी क्षति पहुंच रही है। दिरेहु गांव के निवासी प्रसिद्ध लोक कवि डॉ रामकिशोर शर्मा बेहद कहते हैं कि ऋतुराज वसंत के दौरान मानव के मन और शरीर में प्रकृति के सानिध्य से उत्साह उमंग तथा उल्लास का समावेश हो जाता है। इसका प्रकटीकरण लोक गीतों के माध्यम से होता है। कहा कि होली के परंपरागत गीत मानव को जीवन में आगे बढ़ने को प्रेरित करते हैं लेकिन वर्तमान में होली गीतों में फूहड़ता तथा अश्लीलता का समावेश समाज संस्कृति तथा मानव जीवन के लिए घातक है। दूबेपुर गांव निवासी डॉ हौसला प्रसाद द्विवेदी साहित्यकार कहते हैं कि प्रकृति और मानव के तादात्म्य को होली गीत बसंत ऋतु में परिभाषित करते हैं। इसमें अश्लीलता का कोई स्थान नहीं है। अश्लीलता से मानवीय संस्कार प्रभावित होते हैं जिससे समाज पतनशील होता है। लोक कवि राजेंद्र प्रसाद भ्रमण कहते हैं कि वसंत ऋतु का चरमोत्कर्ष होली पर पर दिखता है। इस चरमोत्कर्ष को वाणी कवि देता है। होली गीत भारतीय लोक संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा समाज को सुखमय जीवन की प्रेरणा देते हैं इनमें अश्लीलता का कोई स्थान बनाना समाज को कुंठित करता है।