कंदवा। होली में एक सप्ताह से भी कम समय बचा है बावजूद इसके कहीं फाग गीत सुनने को नहीं मिल रहे हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ गीत बज रहे हैं लेकिन वह साउंड बाक्सों पर ही सुनाई दे रहा है। ढोल मजीरे, और झाल की थाप पर गीत नहीं सुनाई दे रहे हैं। ऐसा लग रहा है मानो फाग गीत लुप्त हो चुके हैं।
एक समय था कि फाल्गुन माह आते ही ढोल मजीरों की थाप और फाग गीतों की गूंज लोगों को आह्लादित कर देते थे। अब समय के साथ साथ स्वस्थ पारंपरिक फाग गीतों की परंपरा भी लुप्त होती जा रही है। हालांकि गांवों में कुछ बुजुर्ग कहीं-कहीं इस परंपरा को जीवित करने की कवायद में लगे हुए हैं। 1960 - 70 के दशक में फाल्गुन मास आते ही जगह-जगह फाग गीतों व ढोल मजीरों की आवाजें लोगों को घरों से निकलने को विवश कर देती थी। लोग साथ बैठकर स्वस्थ पारंपरिक फाग गीतों का आनंद लेते थे। अब गांव में न अब वह टोली दिखती है न वह स्वस्थ पारंपरिक गीत । वह परंपरा अब लुप्त होने के कगार पर है । सेवानिवृत्त प्राथमिक शिक्षक संघ बरहनी के अध्यक्ष ओमप्रकाश सिंह बताते हैं कि 1960 - 70 के दशक में फाल्गुन माह आते ही गांवों में कई स्थानों पर फाग गीत गाने वालों की महफिलें सजने लगती थी ।लेकिन वक्त के साथ-साथ सब कुछ बदल गया है । अब आधुनिकता की चकाचौंध और पश्चिमी संस्कृति के चलते पुरानी फाग गायकी की परंपरा लुप्त होती जा रही है । उनका कहना है कि फगुवा गायन में विशेषकर ताल , अर्ध तीन ताल , दादरा , कहरवा का आनंद अब दुर्लभ हो गया है । कहा कि इस परंपरा को संरक्षित नहीं किया गया तो यह भविष्य में केवल इतिहास बनकर रह जाएगी।
कंदवा। बसंत पंचमी के दिन होलिका स्थापित करने के बाद जोगीरा और होली गीतों की मदमस्त राग से वातावरण ओत प्रोत हो जाता था । असना गांव निवासी सेवानिवृत्त शिक्षक झारखंडेय सिंह का कहना है कि पहले के होली गीतों में सुर , लय , ताल , साहित्य , विनम्रता और संदेश हुआ करते थे , मगर अफसोस अब ऐसा नहीं है । अब अश्लीलता ज्यादा हो गई है।