लल्ला के लिए रंग-बिरंगा सजा शहर
बुलंदशहर। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी सोमवार को मनाई जाएगी। देवकीनंदन के स्वागत के लिए शहर को रंग-बिरंगी रोशनी से सजाया गया है। कोरोना संक्रमण के कारण जिले के मंदिरों में भव्य कार्यक्रम नहीं होंगे। इस बार श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर 27 साल बाद महासंयोग बन रहा है। इस दिन व्रत कर भगवान श्रीकृष्ण की आराधना करने से सारी मुरादें पूरी होंगी।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के लिए दुकानों पर रंग-बिरंगे आकर्षक झूले, पोशाकें और भगवान श्रीकृष्ण की मूर्तियां उपलब्ध हैं। पंडित राज शर्मा ने बताया कि इस बार श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर 27 साल बाद महासंयोग बन रहा है। इस बार एक ही दिन 30 अगस्त को ही जन्माष्टमी मनाई जाएगी। अष्टमी तिथि 29 अगस्त की रात 11.25 पर शुरू होकर 30 अगस्त की रात 1.59 मिनट तक रहेगी। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर सोमवार का दिन होना भी एक महासंयोग है।
यह है शुभ मुहूर्त
भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करने का शुभ मुहूर्त 30 अगस्त को रात 11.59 बजे से रात 12.44 तक रहेगा। पंडित गिरीश चंद शर्मा ने बताया कि पूजा स्थल पर एक छोटी सी चौकी लेकर उस पर लाल रंग का वस्त्र बिछाएं। उसके ऊपर एक खाली पात्र रखकर भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति स्थापित करें। इसके बाद दीप प्रज्ज्वलित कर भगवान का स्मरण कर उन्हें आमंत्रित करें। भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति को गंगाजल, दूध, दही, घी, शहद, शक्कर और केसर के घोल से स्नान कराएं। इसके बाद वस्त्र पहनाएं और शृंगार करें। साथ ही भगवान श्रीकृष्ण की पसंद की चीजें भोग के रूप में अर्पित करें। रात्रि 12 बजे पूजन करें।
सजे मंदिर, नहीं होगा आयोजन
नगर के मोतीबाग स्थित खाटूश्याम मंदिर के पंडित गौरी शंकर ने बताया कि कोविड के चलते इस बार भी कोई बड़ा आयोजन नहीं होगा। सिर्फ मंदिर और कॉलोनी को फूलों व रंगबिरंगी लाइट से सजाया जाएगा। शाम पांच बजे प्रसाद का वितरण होगा और रात 11 बजे से भगवान का अभिषेक शुरू होगा। राजराजेश्वर मंदिर के पुजारी गजेंद्र भारती ने बताया कि केवल जन्माष्टमी पर लाइट लगाई जाएगी। फूल बंगला और शृंगार का आयोजन होगा। रात को आठ बजे से 12 बजे तक भजन-कीर्तन चलेगा।
श्रीकृष्ण ने अवंतिका देवी मंदिर से किया था रुक्मिणी का हरण
बुलंदशहर। अनूपशहर तहसील का अहार क्षेत्र आज भी श्रीकृष्ण और रुक्मिणी के विवाह का साक्षी है। यहां आज भी सैकड़ों वर्ष पुराने खिरनी, कदम्ब, इंद्रजों के पेड़ हैं, जिनके मेवा और फूलों से ही श्रीकृष्ण की बारात का स्वागत किया गया था। इतना ही नहीं क्षेत्र के कई गांवों के नाम भी श्रीकृष्ण-रुक्मिणी के विवाह की रस्मों पर हैं।
अहार क्षेत्र, जो कभी महारानी रुक्मिणी के पिता महाराज भीष्मक की राजधानी कुंदनपुर के नाम से जाना जाता था। राजा भीष्मक के सात पुत्र और एक पुत्री रुक्मिणी थीं। रुक्मिणी और राजा भीष्मक चाहते थे कि उनका विवाह श्रीकृष्ण के साथ हो, लेकिन रुक्मिणी के भाई और राजा भीष्मक के उत्तराधिकारी रुकम नहीं चाहते थे कि श्रीकृष्ण के साथ विवाह हो। इसका पता जब श्रीकृष्ण को चला तो उन्होंने रुक्मिणी का क्षेत्र के प्राचीन मां अवंतिका देवी मंदिर से हरण कर लिया था। इस दौरान श्रीकृष्ण के भाई बलराम और रूकम के बीच भीषण युद्ध हुआ। बताया जाता है कि बलराम जी ने महाराजा भीष्मक की राजधानी कुंदनपुर को पलट दिया था। आज भी अहार क्षेत्र में मिट्टी खुदने पर मकानों की दीवारें निकलती हैं। इसके बाद श्रीकृष्ण-रुक्मिणी का विवाह हुआ। कुंदनपुर के महाराजा भीष्मक ने श्रीकृष्ण की बारात का स्वागत खिन्नी, कदम, इंद्रजों वृक्ष के फूलों और मेवाओं से किया था। सैकड़ों वर्ष पुराने ये पेड़ आज भी क्षेत्र में अपनी महक बखेर रहे हैं।
इस तरह पड़े गांवों के नाम
बुजुर्गों के अनुसार अहार क्षेत्र के आसपास के करीब दो दर्जन से ज्यादा गांवों के नाम आज भी श्रीकृष्ण-रुक्मिणी विवाह की रस्मों पर आधारित हैं। अहार क्षेत्र के गांव मोहरसा में श्रीकृष्ण का मोहर बंधा था, इसलिए इसका नाम मोहरसा पड़ा। दराबर गांव में श्रीकृष्ण जी का दरबार लगता था। बामनपुर गांव में श्रीकृष्ण की बारात का ब्रह्मभोज हुआ था। गांव सिहालीनगर में श्रीकृष्ण का मोहर मोर के पंखों से बनाया गया था। गांव सिरोरा में श्रीकृष्ण का मोहर सिराया गया था। गांव खंदोई में ब्रह्मभोज के लिए मिट्टी के बर्तन बने थे। यहां पर आज भी मिट्टी के बर्तनों का बहुत बड़ा मेला लगता है। गांव मोहरसा स्थित ऐतिहासिक चामुंडा देवी मंदिर पर वर्ष में दो बार चैत्र और आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को विशाल मेला लगता है। यहां द्वापर युग की याद में श्रद्धालु मिट्टी के बर्तनों की खरीदारी करने आते हैं। कोरोना संक्रमण के चलते इस बार भी मेले का आयोजन नहीं होगा।
अवंतिका देवी पर मौजूद है रुक्मिणी कुंड
अहार में अवंतिका देवी मंदिर के पास गंगा किनारे रुक्मिणी कुंड बना हुआ है। बताया जाता है कि रुक्मिणी रोज अवंतिका देवी मंदिर के पास गंगा स्नान करने आती थीं। मान्यता है कि इस कुंड में स्नान करने से चर्म रोग दूर हो जाते हैं। क्षेत्र के लोगों का कहना है कि कितनी भी बाढ़ आ जाए लेकिन यह कुंड कभी नहीं डूबता है।