बुलंदशहर। जहांगीराबाद क्षेत्र में छह साल की मासूम से दुष्कर्म के मामले में सह-आरोपी को बचाने के लिए विवेचना दबाने वाले दारोगा जांच अधिकारी की चालाकी पॉक्सो कोर्ट में बेनकाब हो गई। पर्याप्त तकनीकी और भौतिक साक्ष्य मौजूद होने के बावजूद सह-आरोपी के खिलाफ चार्जशीट दाखिल न करने पर अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है।
विशेष न्यायाधीश पॉक्सो कोर्ट संख्या-1 विनीत चौधरी की अदालत ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर तीखी टिप्पणी करते हुए एसएसपी को दोषी विवेचक के खिलाफ विभागीय जांच कराकर सख्त दंडात्मक कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।
अदालत ने जहांगीराबाद क्षेत्र के चर्चित मामले में मासूम के साथ दरिंदगी करने वाले अभियुक्त दादा को पूर्व में ही सजा सुना दी थी। मामले की सुनवाई के दौरान सामने आया कि मासूम के साथ की गई हैवानियत का वीडियो सह-आरोपी वीरेंद्र के मोबाइल से बनाकर वायरल किया गया था।
क्षेत्राधिकारी (सीओ) ने मूल आरोप पत्र पर आपत्ति जताते हुए विवेचक को आरोपी से मोबाइल बरामद करने के स्पष्ट निर्देश दिए थे। सीओ के आदेश पर विवेचक ने आरोपी से मोबाइल तो बरामद कर लिया, लेकिन इसके बाद साठगांठ कर केवल नोटिस थमाने की खानापूर्ति की।
विवेचक ने न तो मोबाइल को खंगालकर वीडियो क्लिप की फॉरेंसिक जांच कराई और न ही अदालत में सह-आरोपी के खिलाफ पूरक आरोप पत्र दाखिल किया। विशेष न्यायाधीश ने आदेश में पुलिस की कार्यशैली की बखिया उधेड़ते हुए लिखा जैसा कि पुलिस द्वारा अक्सर किया जाता है कि जब मामले में पर्याप्त साक्ष्य हों और व्यक्ति को सीधे बचाया न जा सके, तो उसके विरुद्ध विवेचना को कभी न खत्म होने वाले रूप में जारी छोड़ दिया जाता है।
इस मामले में भी विवेचक ने आरोपी को अनुचित लाभ पहुंचाने की नीयत से यही हथकंडा अपनाया। अदालत ने इसे प्रथम दृष्टया सह-आरोपी से मिलीभगत करार दिया है। कोर्ट ने आदेश की प्रति एसएसपी को भेजते हुए विवेचक का दंड तय कर रिपोर्ट तलब की है।