सिकंदराबाद। क्षेत्र के किसानों को गाजर की खेती खूब भा रही है। गाजर की खेती में लाभ के चलते प्रतिवर्ष क्षेत्र में गाजर की खेती का रकबा बढ़ता जा रहा है। पिछले पांच सालों में क्षेत्र में गाजर का रकबा बढ़कर डेढ़ गुना हो गया है। वहीं आसपास के क्षेत्रों में भी गाजर की खेती का चलन बढ़ता जा रहा है।
किसान हरकिशन भाटी, नरेश कुमार, सतपाल, आमिर, धर्मेंद्र, सुखपाल आदि ने बताया कि वह विलायती गाजर की खेती करते हैं। गेहूं के स्थान पर वह गाजर की खेती करना पसंद करते हैं। क्योंकि एक बीघा में वह लागत निकालकर 15 से 20 हजार रुपये बचा लेते हैं। विलायती गाजर की बुआई अक्तूबर में की जाती है। फरवरी के आखिरी सप्ताह में गाजर की खुदाई शुरू हो जाती है। मार्च में खेत के खाली होने पर बहुत से किसान मूंग की खेती, बहुत से मक्का आदि की खेती करते हैं। सभी फसल जुलाई तक आ जाती हैं। इसके बाद वह धान की खेती करते हैं। धान की फसल अगस्त तक आ जाती है। इस प्रकार वर्ष में तीन फसल लेकर वह एक बीघा में वर्ष में 35 से 40 हजार रुपये तक बजा लेते हैं। गाजर की खेती में लाभ के चलते क्षेत्र के किसान गाजर की खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं। जिससे क्षेत्र में प्रतिवर्ष गाजर की खेती का रकबा बढ़ता जा रहा है।
खेत से ही व्यापारी खरीद लेते हैं गाजर
सिकंदराबाद। किसानों ने बताया कि गाजर की मांग के चलते व्यापारी खेत से किसानों की गाजर खरीद लेते हैं। किसानों को गाजर बेचने के लिए मंडियों में नहीं जाना पड़ता है। इसके चलते भी गाजर की खेती का चलन बढ़ रहा है।
आधुनिक खेती के चलते कम हुई लागत
सिकंदराबाद। किसानों ने बताया कि आधुनिक खेती के चलते गाजर की खेती करने में लागत भी कम हुई है। वहीं गाजर की उत्तम वैरायटी का बीज भी सिकंदराबाद में ही आसानी से मिल जाता है। गाजर की प्रोसेसिंग, स्टोर करने के लिए भी सिकंदराबाद में ही पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध है। इससे गाजर की खेती को बढ़ावा मिला है।
खाद्य उत्पाद बनाने वाली बड़ी कंपनियां सीधे पहुंच रहीं किसानों के पास
सिकंदराबाद। गाजर की खेती करने वाले कर्नल सुभाष देशवाल ने बताया कि सिकंदराबाद में पैदा होने वाली गाजर की गुणवत्ता उच्च क्वालिटी की है। इसके चलते देश भर में सिकंदराबाद की गाजर की मांग है। क्षेत्र में बड़े पैमाने पर गाजर की खेती होने और गाजर के प्रोसेसिंग, स्टोरेज के लिए पर्याप्त संसाधन होने के कारण सिकंदराबाद गाजर की खेती में नार्थ इंडिया का हब बन गया है। यहां के किसानों को अपनी फसल बेचने के लिए मंडियों, या बाहर नहीं जाना पड़ता है। खाद्य उत्पाद बनाने वाली कंपनियां किसानों से सीधे उनका उत्पाद खरीद रही है।
कृषि विभाग के अनुसार गाजर का रकबा
2019-20 में 1650 हेक्टेयर
20-21 में 1740 हेक्टेयर
21-22 में 1955 हेक्टेयर
22-23 में 2240 हेक्टेयर
23-24 में 2570 हेक्टेयर