उझानी (बदायूं)। नवंबर में भी ठंड का असर कोई खास नहीं होने से फसलों का गणित गड़बड़ा गया है। सरसों की फसल हो या फिर सब्जी फसलों में फूलगोभी, पत्ता गोभी, अधिकांश सब्जियों पर अगेती झुलसा का खतरा बढ़ गया है। सरसों पर इस माह में नमी के दौरान तेजी से वार करती है। हालांकि गेहूं के बुआई के लिए मौसम काफी अनुकूल है, लेकिन आने वाले दिनों में पाला (तुषार) पड़ा तो बचाव के लिए किसानों को खासकर आलू की फसल में सिंचाई पर जोर देना होगा।
ठंड लेट होने की वजह लौंद (पुरुषोत्तम मास) का महीना रहा है। पिछले सालों में नवंबर महीना के शुरू में ही ठंड जोर पकड़ लिया करती थी। इसी के चलते इस बार गेहूं की बुआई भी लेट हो गई है। बताते हैं कि नवंबर के अंतिम सप्ताह में गेहूं के पौधे बढ़वार की ओर अग्रसर हो जाते थे। लेट बुआई शुरू होने से बढ़वार दिसंबर में देखने को मिलेगी। गेहूं के बुआई के लिए मौसम अनुकूल बना हुआ है। ठंड बढ़ने पर सबसे ज्यादा दिक्कत आलू की फसल में आती है। आलू पर अगेती झुलसा रोग के खतरे के बीच सरसों की फसल भी चपेट में आ सकती है। मौसम में नमी के दौरान चटक धूप भी नहीं निकल पाती। मौसम का मिजाज ऐसा ही रहा तो दिसबंर महीना आलू और सरसों की फसल के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। फूल और पत्ता गोभी में कीट पैदा होने की आशंका बनी हुई है। वैसे, पाला और कीट से बचाव के लिए फसलों की समय रहते सिंचाई कर दी जाए तो माहु और अगेती झलसा का प्रकोप कम हो जाता है।
उड़द के उत्पादन में 40 फीसदी तक गिरावट
उझानी। नवंबर महीना के शुरू में पक चुकी उड़द की पैदावार इस बार किसानों की उम्मीद के अनुरूप नहीं रही। उड़द में कमला कीट के अलावा कोई प्रकोप नहीं रहा लेकिन उत्पादन प्रति बीघा एक क्विंटल से भी कम रहा। अधिकतर रकबा में 70 से 80 किलो प्रति बीघा का औसत आया। वैसे, उड़द की पैदावार औसतन डेढ़ क्विंटल प्रति बीघा हुआ करती है। उड़द में ज्यादा लागत भी नहीं आती। बुआई के बाद एक बार निराई और जरूरत पड़ने पर एक ही सिंचाई में फसल पककर तैयार हो जाती है।
आलू की फसल को अगेती झुलसा का खतरा बना हुआ है। फिलहाल जिले में कहीं से भी ऐसी कोई जनकारी सामने नहीं आई है लेकिन पाला पड़ा तो आलू को नुकसान होगा। गेहूं के बुआई के लिए समय काफी अनुकूल है। बुआई को ज्यादा लेट नहीं किया जाए।
-डॉ. संजय कुमार, कृषि वैज्ञानिक