बदायूं। राजकीय मेडिकल कॉलेज में हेपेटाइटिस सी और बी के मरीजों के वायरल लोड की जांच की सुविधा है। जिला अस्पताल से मेडिकल कॉलेज की दूरी पांच किलोमीटर है। बावजूद इसके जिला अस्पताल से वायरल लोड की जांच के सैंपल 300 किलोमीटर दूर लखनऊ भेजे जाते हैं। वहां से दो महीने बाद जांच रिपोर्ट आ पाती है। तब तक मरीज इंतजार ही करता रहता है। उसका इलाज भी शुरू नहीं हो पाता।
राजकीय मेडिकल कॉलेज की लैब अत्याधुनिक मशीनों से लैस है। यहां स्टाफ भी है, बावजूद इसके हेपेटाइटिस-सी और बी के मरीजों की जांच नहीं कराई जा रही। जिला अस्पताल से सालों से मरीजों के सैंपल लखनऊ भेजे जा रहे हैं। रिपोर्ट आने व मरीज का इलाज शुरू हाेने में दो महीने तक लग रहे हैं। अगर जिले में ही वायरल लोड की जांच कराई जाए तो 10 से 15 दिन में ही मरीज को दवा मिल सकेगी। ऐसा होने से मरीजों की हालत भी नहीं बिगड़ेगी और जल्द ही स्वास्थ्य लाभ भी मिलने लगेगा।
अब तक यह है व्यवस्था
जिले भर से हर रोज 10 से 15 मरीज हेपेटाइटिस बी व सी के सामने आ रहे हैं। जिला अस्पताल में इन मरीजों की जांच होती है, लेकिन वायरल लोड की जांच जिला अस्पताल में नहीं होती। अस्पताल प्रशासन हर मंगलवार को मरीजों के सैंपल लेता है और महीने में एक बार 150 से 200 सैंपलों को जांच के लिए लखनऊ भेजता है। रिपोर्ट आने में दो महीने लग जाते हैं। मरीज को दो महीने के बाद ही दवा मिल पा रही है।
क्या है वायरल लोड
वायरल लोड परीक्षण किसी व्यक्ति के खून में वायरस की मात्रा का पता लगाने के लिए किया जाता है। यह परीक्षण, कई तरह की बीमारियों के लिए किया जाता है, जैसे कि एचआईवी और हेपेटाइटिस सी आदि।
मेडिकल कॉलेज में लैब के साथ टेक्नीशियन भी हैं। वायरल लोड की जांच के समुचित संसाधन हैं। अगर सैंपल आते हैं तो जांच की जाएगी। लखनऊ सैंपल भेजने की जानकारी नहीं है, जिला अस्पताल में दवा की सुविधा है तो जिला अस्पताल प्रशासन ही सैंपल के बारे में पूरी जानकारी दे सकता है। - डॉ.अरुण कुमार, प्राचार्य मेडिकल कॉलेज
अब तक लखनऊ सैंपल भेजे जा रहे हैं। पिछले महीने राजकीय मेडिकल कॉलेज की लैब को 50 सैंपल भेजे थे, वही सैंपल लखनऊ भेजे गए थे। इन सैंपलों की रिपोर्ट आई तो 87 फीसदी जांच मिलान खा रही थी। अब उच्चाधिकारियों को पत्र भेजकर मेडिकल कॉलेज में ही वायरल लोड की जांच कराने की अनुमति मांगी गई है। - डॉ. कप्तान सिंह, सीएमएस, जिला अस्पताल