एक साल 12 दिन बाद शनिवार को दोनों भाई जिले की सीमा में पहुंचे। यहां लोगों ने कांवड़ में बैठी मां को कंधे पर ले जा रहे दोनों बेटों को देखा तो उनका सत्कार किया। मुजरिया चौराहे पर रहने वाले सुमित साहू उन्हें चाय नाश्ता कराया। वहीं, उनके पिता रामौतार ने फल खिलाए।
माता-पिता की करनी चाहिए सेवा
तेजपाल और धीरज का कहना है कि मां को कांवड़ में बैठाकर चारधाम की यात्रा कराने के पीछे उनका उद्देश्य सिर्फ इतना है कि वह समाज को संदेश देना चाहते हैं कि बुजुर्ग मां-बाप बोझ नहीं होते, उनकी मरते दम तक सेवा करनी चाहिए। उन्हें वृद्धाश्रम में नहीं छोड़ना चाहिए। लोग उनसे प्रेरित हो, इस उद्देश्य से उन्होंने पदयात्रा शुरू की थी।
दोनों भाइयों ने बताया कि वह करीब 20 साल पहले हिमाचल प्रदेश की तहसील बद्दी के मंधाला गांव में रहते थे। जब वह छोटे थे। तब उनके पिता भगवान दास का बीमारी के कारण निधन हो गया था। इसके बाद उनकी मां बिसौली के गांव नूरपुर ले आई। यहां मां ने उनकी बड़े ही लाड़ प्यार से परवरिश की। तेजपाल ने बताया कि उनकी एक बहन पार्वती भी है। उसने भी उन्हें इस यात्रा के लिए प्रेरित किया था। उनकी मां राजेश्वरी ने बताया कि वह खुशकिस्मत है कि उनके श्रवण कुमार जैसे दोनों बेटे मिले हैं।