उझानी। अवंतिका वाटिका में चल रही श्रीमद्भागवत कथा में रामचंद्राचार्य ने दूसरे दिन बुधवार को कहा कि शास्त्रों के सिद्धांतों का पालन करना ही धर्म का वास्तविक स्वरूप है। धर्म के विपरीत चलने की शिक्षा ईश्वर नहीं देते। इसी तरह दुख की धड़ी में धैर्य और विश्वास की परीक्षा होती है।
रामचंद्राचार्य ने कहा कि मनुष्य के जीवन में सुख और दुःख, लाभ और हानि, सफलता और असफलता का आना स्वाभाविक है। सनातन धर्म के अनुसार, मनुष्य को हर परिस्थिति में अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए सत्य, न्याय और सदाचार के मार्ग पर चलना चाहिए। सुख के समय अहंकार नहीं करना चाहिए और दुःख के समय धैर्य तथा ईश्वर पर विश्वास नहीं खोना चाहिए।
श्रीमद्भागवत में भगवान श्रीकृष्ण ने कर्म, कर्तव्य और धर्म के पालन का संदेश दिया है। व्यक्ति को परिस्थितियों से विचलित हुए बिना अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए। जीवन में आने वाला दुःख मनुष्य के धैर्य, विवेक और आस्था की परीक्षा बन सकता है। कठिन समय में ही यह पता चलता है कि व्यक्ति अपने सिद्धांतों पर कितना दृढ़ है। विपरीत परिस्थितियों में भी जो व्यक्ति अधर्म का सहारा नहीं लेता और सत्य का मार्ग नहीं छोड़ता, वही वास्तविक अर्थों में धर्म का पालन करता है।
रामचंद्राचार्य ने कहा कि धर्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ करना नहीं, बल्कि अपने आचरण में सत्य, करुणा, ईमानदारी, न्याय और मानवता को अपनाना भी है। शास्त्रों की शिक्षाओं को समझकर जीवन में उतारना व अपने कर्मों की जिम्मेदारी स्वीकार करना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है। सुख-दुःख जीवन का हिस्सा हैं, लेकिन किसी भी परिस्थिति में धर्म और सत्य का त्याग नहीं करना चाहिए। कथा में श्रोताओं में जयपाल सिंह, अंजू सिंह चौहान, लल्लू सिंह, कमलेश वार्ष्णेय, राहुल शंखधार, गिरीशपाल सिंह, रवि समदर्शी, राजीव लोचन, पुरुषोत्तम, मोहित शर्मा, आलोक त्रिवेदी, राममोहन शर्मा, गोपाल शर्मा आदि भी मौजूद रहे।