प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में सरकार बनने के बाद आया फरमान तो सुना ही होगा कि 15 जुलाई तक सड़कें गड्ढामुक्त हो जाएंगी। इस दावे की हकीकत जानने के लिए यहां बाइपास से मानकपुर होकर बरायमखेड़ा की ओर चलें तो जो तस्वीर नजर आएगी, वह किसी दुर्गम रास्ते से कम नहीं। सफर की शुरुआत का पहला कदम गड्ढे में पड़ेगा। पैदल निकलें या फिर घोड़ा-बुग्गी से हिचकोलों के सिवाय कुछ और महसूस नहीं होगा। ऐसा भी नहीं कि अफसरों का ध्यान गड्ढायुक्त सड़क की ओर नहीं जाता। फिर न जाने क्यों, मरम्मत का भी नंबर नहीं आ पाता।
मानकपुर से बरामयखेड़ा तक करीब 12 किलोमीटर दूरी की सड़क का निर्माण दो दशक पहले हुआ था। मानकपुर, रौली, जमरौली, बिहार-बरसुआ, बिहार-हरचंद, दूदेनगर, खेड़ा शहजादनगर, रोशननगर और बरायमखेड़ा तक गड्ढों के बीच दो-चार स्थानों पर सड़क नजर तो आएगी लेकिन ज्यादातर स्थानों पर डॉमर को छोड़िए, उसके नीचे बिछी ईंटों का फर्श ही गायब नजर आएगा। हालांकि एक दशक पहले पीडब्ल्यूडी ने मानकपुर से जमरौली तक जीर्णोद्धार कराया भी लेकिन इलाके के ग्रामीणों को ज्यादा दिन तक फायदा नहीं मिल पाया। खस्ताहाल सड़क से जुड़े गांवों की आबादी पर गौर करें तो करीब 70 हजार ग्रामीणों की आवाजाही रहती है। इसी सड़क से गढ़ी, दबिहारी और अब्दुल्लागंज को भी संपर्क मार्ग निकलते हैं। रास्ते में चार पुलिया भी हैं। एक भी पुलिया ऐसी नहीं जो क्षतिग्रस्त नजर न आए। सबसे ज्यादा दिक्कत मानकपुर गांव से होकर गुजरते वक्त सिर्फ इसलिए आती है कि सड़क पर गड्ढों में भरी कीचड़ कभी सूखने का नाम ही नहीं लेती। बरसात के दिनों में तो घुटनों तक पानी में होकर गुजरना ग्रामीण राहगीरों की नियति बन जाता है।