उघैती में टेसू के साथ घूम रहे बच्चे। संवाद
उघैती। सदियों से चली आ रही टेसू की प्राचीन परंपरा अभी भी बखूबी निभाई जा रही है। शाम होते ही टेसू और झांझी के साथ बच्चे निकल रहे हैं। लोग उन्हें अनाज और पैसे देकर विदा कर रहे हैं। वह घर-घर जाकर टेसू के गीत गा रहे हैं।
बच्चे गाते हैं कि मेरा टेसू यही अदा, खाने को मांगे दही बड़ा, सूख गया मेरा टेसू एक टांग पर खड़ा-खड़ा। इसी तरह हंसी ठिठौली के बीच दरवाजे-दरवाजे बच्चों को पैसे मिल रहे हैं और अनाज भी मिल रहा है। नवरात्र से दशहरा तक इस परंपरा का चलन है। धीरे-धीरे यह परंपरा कुछ क्षेत्रों में ही सिमट कर रह गई है। उघैती कस्बा और आसपास के गांवों में आज भी बच्चों ने इस परंपरा को जीवित रखा है। शाम होते ही बच्चों की गीत गाती टोलियां घर-घर पहुंच रही है।
टेसू के साथ झांझी की हो रही पूजा
लड़के टेसू बनाकर पूजन करते हैं और घर-घर जाकर अनाज व पैसे मांग रहे हैं। लड़कियां झांझी की पूजा करती हैं। शरद पूर्णिमा पर इनका विवाह कराया जाएगा। पंडित मंत्रोच्चार करेंगे और महिलाएं गीत गाएंगी। बाद में इन्हें कुएं या तालाब में विसर्जित किया जाएगा।
-
परंपरा के पीछे की कहानी
महाभारत काल की इस परंपरा के केंद्र में बर्बरीक है। वह पराक्रमी था। श्री कृष्ण ने उसकी परीक्षा ली तो वह युद्ध कला में बहादुर निकला। तीन लकड़ियाें पर उसके सिर को टांग कर श्रीकृष्ण ने पूरा महाभारत उसे दिखाया था। टेसू भी तीन डंडियाें से बनाया जाता है।