जिले में एक देहाती कहावत प्रचलित है ‘कंधा बजे बेताल, खुरपिया ठौर ही बाजे’। मतलब कंधे तो खूब हिलते दिखते हैं लेकिन खुरपी एक ही जगह चलती रहती है। यह कहावत प्रशासनिक मशीनरी पर सटीक बैठती है। मंगलवार को तहसील दिवस, बुधवार को किसान दिवस और शनिवार को समाधान दिवस। यानी जनसमस्याओं के निस्तारण के लिए एक ही जगह अधिकारियों का जमावड़ा लगता है। बावजूद इसके लोगों की शिकायतें दूर नहीं हो पा रही है।
हालांकि इन दिवसों की खास बात यह रही कि शिकायतें आईं, जिनसे बैंकों के घोटाले, चीनी मिलों के घपलों का पर्दाफाश हुआ। सैकड़ों बीघा जमीनों पर कब्जे के मामले उजागर हुए हैं।
केस- एक
तहसील दिवस में नहीं निपटा चरसौरा झील प्रकरण
बिसौली तहसील क्षेत्र के गांव विक्रमपुर चरसौरा में झील के क्षेत्रफल में खेती करने का प्रकरण तहसील दिवस में 12 बार जा चुका है। ग्राम प्रधान बच्चू सिंह ने बताया कि उनके परिवार के कैलाश सिंह समेत गांव के अन्य लोग जनहित के इस प्रकरण को तहसील दिवस में ले जाते हैं लेकिन वहां से आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। एसडीएम बिसौली गुलाबचंद ने तो उनसे यहां तक कह दिया कि मछली पालन के लिए पट्टा दिया गया है। बड़ी रकम पट्टा धारक दे रहा है तो खेती तो करेगा ही। करीब सवा चार सौ बीघा में झील है। 80 बीघा में पानी रह गया है। पट्टाधारक ने बाकी झील के फाट में गेहूं और सरसों आदि की खेती गैरकानूनी तरीके से कर रखी है।
केस- दो
खुद अधिकारियों ने पैदा कर दी समस्या
सदर तहसील का गांव है गुलाबगंज गनियाई। इसमें गांव की अतिरिक्त भूमि दर्शाकर इस पर गरीबों के पट्टे कर दिए गए। यहां तैनात रहे लेखपाल ने नक्शा और पत्राजात गायब कर दिए। उस पर कार्रवाई भी हुई। बाद में वन विभाग ने इस भूमि पर अपना दावा ठोंक दिया। जिला के बॉर्डर का मामला था। पैमाइश के समय कासगंज जिला के अधिकारी भी पहुंचे। वन विभाग की जगह मान ली गई और पट्टे समेत अन्य किसानों की जमीनें वन विभाग के सुपुर्द कर दी गईं। पूर्व प्रधान राजेश्वर सिंह उर्फ राजू कश्यप ने इस मामले को तहसील दिवस ले लेकर जिला, कमिशभनरी और राजधानी तक उठाया। प्रधान का कहना है कि जब तहसील पर उस इलाके का नक्शा नहीं है, जो वह लिखित में स्वीकार चुके हैं तो पैमाइश किस आधार पर हो गई।
विशेष दिवसों में शिकायतों की संख्या कम न होने को कई तरीके से लिया जा सकता है। पहला यह कि शिकायतों का निस्तारण हो रहा है। दूसरा यह कि विरोधियों को फंसाने में झूठी शिकायतों का प्रचलन बढ़ा है। हां, कुछ मामले जरूर ऐसे हैं, जो निस्तारण में कमी से जुड़े हैं।
- अशोक कुमार श्रीवास्तव, एडीएम प्रशासन