बदायूं। राजकीय मेडिकल कॉलेज में छात्र-छात्राओं को एमबीबीएस की पढ़ाई तो कराई जा रही है, लेकिन इन लोगों को पोस्टमार्टम करना नहीं सिखाया जा रहा। कारण, मेडिकल कॉलेज में पोस्टमार्टम हाउस नहीं है। मजबूरी में एमबीबीएस के छात्रों को स्वास्थ्य विभाग के पोस्टमार्टम हाउस में साल में दो-चार बार प्रशिक्षण दिलाया जा रहा है।
मौजूदा समय में मेडिकल कॉलेज में चार सौ छात्र-छात्राएं पढ़ाई कर रहे हैं। यहां एमबीबीएस की पढ़ाई के साथ ही पोस्टमार्टम करना सीखना भी आवश्यक होता है। नियमानुसार हर छात्र को एक साल के अंदर 15 बार पोस्टमार्टम सिखाए जाने का प्रावधान है। एनएमसी की भी गाइडलाइन है कि एमबीबीएस के सभी छात्रों को पोस्टमार्टम प्रशिक्षण की प्रक्रिया से गुजरना होगा, लेकिन यहां ऐसा हो नहीं पा रहा।
वजह है कि मेडिकल कॉलेज के पास अपना पोस्टमार्टम हाउस नहीं है। ऐसे में छात्र-छात्राओं को जिले की मोर्चरी और पोस्टमार्टम हाउस पर ले जाया जाता है, लेकिन वो भी कभी कभार। इससे मेडिकल की पढ़ाई करने वाले विद्यार्थी ढंग से पोस्टमार्टम करना सीख भी नहीं पा रहे। नियम है कि एक साल में एमबीबीएस के विद्यार्थियों को साल में 15 बार प्रशिक्षण लेना आवश्यक होता है, जबकि उन्हें चार से पांच ही प्रशिक्षण मिल पा रहे हैं।
फॉरेंसिक विभागाध्यक्ष की होती है जिम्मेदारी
पोस्टमार्टम की प्रक्रिया सिखाने की जिम्मेदारी मेडिकल कॉलेज में फॉरेंसिक विभाग के अध्यक्ष की होती है, लेकिन विभाग इस जिम्मेदारी को ठीक से नहीं निभा रहा। मेडिकल कॉलेज में भले ही पोस्टमार्टम हाउस नहीं बना है, लेकिन जिले में पोस्टमार्टम की सुविधा शहर में है। इसके बाद भी छात्रों को पोस्टमार्टम हाउस पर नहीं ले जाया जा रहा है। यही कारण है कि उन्हें चार से पांच ही प्रशिक्षण मिल पा रहे हैं।
मेडिकल कॉलेज में अभी पोस्टमार्टम हाउस व मोर्चरी नहीं बन सकी है। इसको जल्द बनवाने का प्रयास किया जाएगा। जिला अस्पताल प्रबंधन से सहयोग लेकर पोस्टमार्टम हाउस पर छात्रों को मानक के अनुसार भेजा जाएगा। पिछले समय में क्या हुआ है, यह पता नहीं। - डाॅ. अरुण कुमार, प्राचार्य राजकीय मेडिकल कॉलेज