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विकलांगता नहीं आने दी आड़े, बुलंदियों के झंडे गाड़े

Wed, 02 Dec 2015 09:41 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो, बदायूं
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अभावों के बीच विकलांगता को मात देकर पाई मंजिल
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विकलांगता को मात दे अखिलेश बने आईएएस
 जिले की बिसौली तहसील का छोटा सा कस्बा है आसफपुर। कस्बे के बेहद पिछड़े गांव से ताल्लुक रखने वाले अखिलेश शर्मा दायें पैर से विकलांग हैं। पिता सिंचाई विभाग में सींच पर्यवेक्षक थे। चार भाई बहनों में तीसरे नंबर के अखिलेश की प्रारंभिक शिक्षा गांव के ही प्राइमरी स्कूल में हुई। इंटर मीडिएट आसफपुर के त्रिवेणी सहाय इंटर कॉलेज से करने के बाद 2006 में पीजी की पढ़ाई एसएम कॉलेज चंदौसी से किया। इसके बाद चार साल इलाहाबाद में और एक साल दिल्ली में सिविल सेवा की कोचिंग। अखिलेश के इरादे बुलंद थे। उन्होंने विकलांगता को मात दे दी। आखिर 2012 में भारतीय प्रशासनिक सेवा में अखिलेश शर्मा का चयन हो गया। वह आईएएस अफसर बने। अखिलेश इन दिनों केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर सूचना और प्रसारण मंत्रालय में डायरेक्टर के पद पर तैनात हैं। बेटे की कामियाबी से पिता का सीना भी चौड़ा हो गया है।
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बैडमिंटन में माहिर हैं विकलांग शिक्षक प्रेमपाल
शहर से सटे एक छोटे से गांव सनाय के एक मामूली किसान के बेटे प्रेमपाल सिंह उन लोगों को प्रेरणा दे रहे हैं जो शरीरिक विकलांग हैं। एक पैर और एक हाथ से विकलांग होने के बावजूद अपने इरादों के दम पर प्रेमपाल सिंह आज उसी कॉलेज में शिक्षक हैं जहां उन्होंने शिक्षा हासिल की। उन्होंने कभी विकलांगता को आड़े नहीं आने दिया। डबल एमए के साथ एमएड किया। प्रारंभिक शिक्षा भरकुइयां प्राथमिक विद्यालय में हुई। इंटरमीडिएट नगला इंटर कॉलेज से किया। परास्नातक की पढ़ाई मुरादाबाद के केजी डिग्री कॉलेज से करने के बाद अब वह नगला इंटर कॉलेज में ही हिंदी के लेक्चरर हैं। भले ही वह विकलांग हों, लेकिन बैडमिंटन में माहिर हैें। कई पदक भी जीते हैं। प्रेमपाल को तैराकी का भी शौक है। बेटा रोहित और बेटी रागिनी एमएसी कर रहे हैं। दोनों संतानों को अपने पिता पर गर्व है।
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