फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

उद्देश्य में सफल नहीं हो पा रही उपभोक्ता अदालत

Sat, 14 Mar 2015 07:46 PM IST
badaun
विज्ञापन
विज्ञापन
उपभोक्ताओं को न्याय दिलाने और शोषण करने वालों को दंडित करने के लिए कार्यरत जिला उपभोक्ता संरक्षण फोरम पुलिस प्रशासन के असहयोग एवं बुनियादी सुविधाएं न मिलने की वजह से अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पा रही है। इसके चलते मौजूदा उपभोक्ता अदालत सिविल कोर्ट का रूप धारण करने लगी है, जैसे सिविल कोर्ट में वर्षों मुकदमे चलते हैं। यहीं स्थिति इन दिनों उपभोक्ता फोरम की हो रही है। स्टाफ का भी टोटा है। इससे फोरम में अनिर्णीत मुकदमों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है। हालांकि फैसले भी हो रहे हैं।
विज्ञापन

जिले के आम उपभोक्ता कि धारणा की बात करें तो ‘न्याय की चक्की’ धीमा पीस रही है। थोड़ा पीछे जाएं, तो उपभोक्ता संरक्षण अधिनियिम 1986 में अस्तित्व में आया। शुरू से इस कानून का किसी को अंदाजा नहीं था, लेकिन धीरे-धीरे उपभोक्ता अदालतों ने जब उपभोक्ताओं की शिकातयों को मुफ्त तथा कम समय में निपटाना शुरू किया तो इसका महत्व लोगों को पता चलने लगा। शुरूआती दौर में इस प्रावधान का उल्लंघन होता रहा है। पर अब यह प्रत्येक जिले में उपभोक्ता अदालतें हैं। इसके काम करने के तरीके में जरूर अंतर आ गया। उपभोक्ता हितों के मामले सालों तक लटके रहते हैं। जबकि अधिनियम के तहत दायर प्रत्येक मुकदमे का निस्तारण 90 दिन में हो जाना चाहिए। ऐसा बहुत कम ही देखा गया है , जब किसी का निपटारा 90 दिन में किया गया हो।
वर्तमान की बात करें तो जिले में उपभोक्ता अदालत हालात खराब हैं। स्टाफ की कमी के चलते केस लंबे खिंच रहे हैं। सैकड़ों की संख्या में स्थानीय उपभोक्ता वर्षों से अपने फैसले का इंतजार कर रहे हैं। हालांकि इसमें तनिक भी संदेह नहीं है कि पिछले दस वर्षों में अपने उपभोक्ता अधिकारों को लेकर जिले के वाशिंदों में जागरूकता बढ़ी है। उपभोक्ताओं में नई जागरूकता पैदा करने में उपभोक्ता अदालत की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। देर से ही सही, लेकिन अनेक महत्वपूर्ण फैसलों से उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों के प्रति सचेत करने में फोरम का विशेष योगदान रहा है। फिर भी जिले में उपभोक्ता अधिकारों की स्थिति कोई विशेष उत्साह पैदा करने वाली नहीं है।
विज्ञापन


पहले मुफ्त, अब लगती है कोर्ट फीस
उपभोक्ता अदालत में वकीलों की उपस्थिति भी इसकी लंबी और जटिल न्यायिक प्रक्रिया का प्रमुख कारण है। यद्यपि आम नागरिक भारतीय उपभोक्ता गरीब एवं अशिक्षित है, इस वजह से शुरूआत समय में फोरम को कोर्ट फीस से मुक्त रखा गया था। बाद में इसमें संशोधन कर फोरम में भी कोर्ट फीस का प्रावधान कर दिया गया है। उपभोक्ता फोरम अधिवक्ता मंच के अध्यक्ष एडवोकेट अशोक कुमार वर्मा बताते हैं इसमें अब एक लाख क्लेम के लिए सौ रुपये, दो लाख तक दो सौ, अधिकतम बीस लाख के लिए पांच सौ रुपये कोर्ट फीस तय की गई है।

बड़ी कंपनी उठाने लगीं फायदा
फीस रखे जाने और न्यायिक प्रक्रिया में देरी के चलते उपभोक्ताओं को जरूर न्याय का इंतजार करना पड़ रहा है। वहीं कानूनी छिद्रों का फायदा उठाकर बड़ी-बड़ी कंपनी उपभोक्ता अदालतों का फायदा उठा रही हैं। काबिलेगौर हो कि अनेक कंपनी निर्माता फोरम अदालत के आदेश की अवमानना करती हैं। हालांकि कोर्ट के निर्णय का पालन न करने पर दो हजार से दस हजार तक का जुर्माना अथवा एक माह से 36 माह की अवधि की सजा का प्रावधान है, लेकिन कानून कठोर न होने से ऐसे अनेक फैसले पुलिस की ढिलाई के कारण क्रियांवित नहीं हो पाते हैं।

सात लाख का दिलाया था मुआवजा
बदायूूं। एडवोकेट अशोक कुमार वर्मा बताते हैं कि न्यायिक प्रक्रिया में देर जरूर हुई, लेकिन न्याय मिला। बताते हैं कि मोहम्मद सैफुल को बरेली के एक अस्पताल में ऑपरेशन के दौरान गलत तरीके से एनेथेस्टिक लगा दिया था। इससे उसकी टांग खराब हो गई। उपभोक्ता फोरम में केस आने पर सात लाख का मुआवजा दिलाया गया। हालांकि उसका अभी इलाज चल रहा है। इसके अलावा इसरार अहमद को इंश्योरेंस कंपनी से चार लाख रुपये तथा बबराला के वेदव्रत द्विवेदी को न्याय दिलाया था। बताते हैं कि मामले गंभीरता से निपटाए जाते हैं और न्याय दिलाया जाता है।
सामान खरीदते समय बिल जरूर लें
ग्राहकों को सामान और सेवाओं की खरीद करने पर भुगतान की रसीद न देना अब मैन्यूफैक्चरर्स और सर्विस प्रोवाइडर्स को कानूनी उलझन में डाल सकता है। लिहाजा बिल जरूर दें। रिटायर्ड उपभोक्ता फोरम के अध्यक्ष बताते हैं कि हर आइटम का बिल तथा गारंटी कार्ड लें। बताते हैं कि डॉक्टर्स भी उपभोक्ता फोरम के दायरे में आते हैं।
उपभोक्ता संरक्षण फोरम कारगर है। अगर सही तरीके से मुकदमा दायर होता है। तो रिलीफ भी मिलता है। उपभोक्ताओं को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होना चाहिए। सामान लेते हुए भी जागरूकता का परिचय देना चाहिए। यहां स्टाफ कम है, अगर इसकी पूर्ति हो जाए तो समय से मामले निपटाए जा सकते हैं। - अरुण कुमार सिंह, सेवानिवृत्त जज एवं भूतपूर्व अध्यक्ष, उपभोक्ता संरक्षण फोरम।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें