मजबूरी में गांव की महिलाओं को होना पड़ता है शर्मसार
गांव में सरकारी अनुदान का एक भी शौचालय नहीं
गांव नरऊ के घरों में आज भी शौचालय नहीं हैं। गांव के करीब 80 फीसदी घरों की महिलाएं खुले में शौच जाने को मजबूर हैं। इसके अलावा खास बात यह है कि ग्राम प्रधान भी खुल में शौच करने को मजबूर नजर आईं।
ब्लॉक मुख्यालय के नजदीक के गांव नरऊ की आबादी करीब तीन हजार है। एक हजार से अधिक वोटर संख्या वाले इस गांव की महिलाओं का दुर्भाग्य ही कहेंगे जो पिछले सालों में खासकर शौचालय को लेकर सरकारी अनुदान का लाभ उन्हें नहीं मिला। स्वच्छ भारत मिशन के तहत नरऊ पहुंचकर ग्रामीणों को खुले में शौच नहीं करने के लिए प्रेरित तो किया लेकिन महिलाओं ने जब उनके सामने शौचालय बनाने में आर्थिक समस्या बताई तो कोई जवाब नहीं मिला। टीम के सदस्यों ने देखा कि प्रधान ही नहीं बल्कि अधिकतर महिलाएं शौच करने को खेतों की ओर निकल पड़ी हैं। शौच के दौरान रास्ते से होकर ग्रामीण या फिर कोई राहगीर निकल जाए तो महिलाओं को शर्मसार होना पड़ता है।
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उझानी। नरऊ गांव में खुले में शौच की समस्या को लेकर सचिव सुधीर कुमार शर्मा ने पहले तो यह कहकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की- पिछले सप्ताह ही चार्ज मिला है। फिर बोले, सर्वे कराया जा चुका है। आवश्यकता तीन सौ से अधिक शौचालयों की है फिलहाल तीन दर्जन ग्रामीणों के नाम सूची में शामिल कर लिए गए हैं।
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ग्रहणी नत्थो ने बताया कि शौचालय बनवाने के लिए उसने शुरू में दो हजार रुपये जमा किए थे कि अनुदान मिलने पर वह शौचालय बनवा लेगी, लेकिन बच्चा बीमार हो गया और रकम दवा में खर्च हो गई। अब तो सरकार से ही उम्मीद है। वही अनुदान मुहैया कराएगी।
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ग्रामीण भजनलाल की पत्नी उर्मिला पिछले सप्ताह उस वक्त ज्यादा परेशानी हुई जब महिला रिश्तेदार घर आई। उसका कहना है कि रिश्तेदार की बेटी ने खुले में शौच को जाने से इंकार कर दिया। जैसे तैसे पड़ोसी से बात की और लड़की को उनके यहां भेजा। अगर पड़ोसी मदद नहीं करते तो उसके सामने मुंह दिखाने लायक नहीं बचती।
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मिथलेश कहती हैं कि खुले में शौच कोई खुशी में नहीं जाती। मजबूरी है, घर में संसाधनों का अभाव और सरकार गौर नहीं करती। अफसर आकर कह जाते हैं कि हर घर को शौचालय मिलेगा, लेकिन एक दशक में उसे भरोसे के अलावा कुछ नहीं मिला। बच्चों की पढ़ाई और खाना खर्चा से कुछ बचे तभी तो शौचालय बनेगा।
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वृद्धा सूरजादेवी ने बताया कि घर की बहू-बेटियों से पूछो कि वे किस कदर परेशान हैं। शौचालय नहीं होने की वजह से सुबह और शाम को जो दिक्कत होती है, उसे सोच कर दु:ख होता है। गांव के आसपास ऐसी भी कोई जगह नहीं है जिसकी आड़ लेकर बैठ जाएं। फसलों के अलावा कोई और रास्ता भी नहीं बचता।
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वर्जन
शौचालय बनवाने के लिए पिछले साल सचिव से बात की थी। चूंकि वह अशिक्षित हैं, सो ज्यादातर कामकाज बेटा ही देखता है। शौच को मैं भी खेत में जाती हूं लेकिन दो-तीन महीना में हालात सुधरने लगेंगे। सचिव को भी प्रस्ताव तैयार कराने को कहा है। अनुदान कब और कैसे मिलेगा, यह भी अफसर ही जानें।- शकुंतला देवी, प्रधान, नरऊ