बदायूं। शिक्षा के लिए सरकार कई योजनाएं चला रही है, लेकिन स्कूलों में खेलकूद की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। जिस प्रकार युवाओं में खेल को लेकर उत्साह है, वैसा सहयोग उनको स्कूल और शासन की ओर से नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में आवश्यक सुविधाओं के अभाव में उनकी प्रतिभा भी नहीं निखर पा रही है। जिले भर में आज भी कई स्कूल-कॉलेज ऐसे हैं, जिनमें खेल मैदान नहीं है। जिन स्कूलों में खेल मैदान है तो वहां खेल सामग्री उपलब्ध नहीं है। खेल सामग्री है तो खेल अध्यापक नहीं हैं। ऐसे में खिलाड़ी जाएं तो जाएं कहां।
कुछ ऐसी ही स्थिति शहर के राजकीय इंटर कॉलेज की है। कॉलेज में विशाल खेल का मैदान है, लेकिन खेल सामग्री और खेल अध्यापक नहीं है। ऐसे में बच्चे स्वयं ही खेल खेलते हैं। कॉलेज प्रशासन का दावा है कि खेल सामग्री की कोई कमी नहीं है। हां, खेल अध्यापक नहीं है। खेल अध्यापक मोहम्मद इमरान का लगभग छह वर्ष पहले निधन हो गया। तब से खेल अध्यापक की व्यवस्था नहीं हुई। हालांकि कॉलेज के ही सोशल स्टडी के सहायक अध्यापक हरिबाबू सक्सेेना को खेल की जिम्मेदारी दी गई है। अब इतिहास-भूगोल पढ़ाने वाले शिक्षक छात्रों को खेल के प्रति क्या मार्गदर्शन दे पाएंगे, यह बड़ा सवाल है। शायद यही कारण है कि कॉलेज से खिलाड़ी अपने बल पर जिला स्तर तक तो पहुंच जाते है, लेकिन उससे आगे का मंच सही मार्गदर्शन की वजह से छूट जाता है। इससे तमाम युवा खिलाड़ियों को मंजिल नहीं, बल्कि मंजिल के नाम पर सिर्फ निराशा ही हासिल होती है।
छात्र बोले- खेल सामग्री भी नहीं
राजकीय इंटर कॉलेज के छात्रों ने बताया कि स्कूल में खेल सामग्री भी नहीं हैं। अपने आप ही अन्य खिलाड़ियों की मदद से खेलते रहते हैं। खेल के नियम होते हैं, जिनकी उनको जानकारी भी नहीं है। यही वजह है कि जिला स्तर तक खिलाड़ी पहुंच जाते है, लेकिन नियम और प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी की भाषाओं को नहीं समझ पाते। इससे उनको आगे बढ़ने का मौका नहीं मिलता। दौड़, कूद जैसे खेलों में तो कोई आवश्यकता नहीं है, लेकिन अन्य खेलों के लिए खेल अध्यापक की बहुत आवश्यकता है।
खेल सामग्री की तो कोई कमी नहीं है, लेकिन खेल अध्यापक हमारे यहां नहीं है। सामाजिक विषय के सहायक अध्यापक को खेल की जिम्मेदारी दी गई है। वही छात्रों को खेल कराते हैं।
-राजकपूर वर्मा, प्रधानाचार्य, राजकीय इंटर कॉलेज