बदायूं/बरेली। डॉक्टरों को धरती का भगवान माना जाता है लेकिन यही भगवान कभी-कभी अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लेते हैं तो मरीज को जान से हाथ तक धोना पड़ जाता है। सामूहिक दुष्कर्म और हत्याकांड में भी यही हुआ। एडीजी जोन के आदेश पर शुरू हुई पुलिस जांच में सामने आया है कि गंभीर हालत में महिला को चंदौसी के अस्पताल ले जाया गया था, लेकिन वहां के किसी चिकित्सक ने उसे भर्ती नहीं किया। अब पुलिस के हाथ दोषियों तक पहुंच गए हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है।
पुलिस की विवेचना में इस बात की पुष्टि हुई है कि तीन जनवरी की रात मुख्य आरोपी पुजारी सत्यनारायण दास, वेदराम और चालक जसपाल घायल महिला को चंदौसी के एक निजी अस्पताल ले गए थे। एक निजी अस्पताल में महिला का पर्चा भी बन गया था, लेकिन जब डॉक्टर ने उसकी हालत देखी और परिवार का कोई व्यक्ति मौजूद न होने की बात पता चली तो इलाज करने से मना कर दिया। जबकि दो अस्पतालों ने उसे बाहर से ही भर्ती करने को मना कर दिया था। बताते हैं कि डॉक्टर पुलिस के पचड़े में पड़ना नहीं चाहते थे और उनके पास बहाना था कि महिला के परिवार को कोई सदस्य साथ नहीं था। ऐसे में उन्होंने न तो महिला का इलाज किया और न ही पुलिस को सूचना देना मुनासिब समझा। इस कारण महिला की हालत बिगड़ती चली गई, जिससे आरोपियों के हाथ पैर फूल गए थे। वह महिला को उसके घर छोड़ तो आए थे, लेकिन इतना डर गए थे कि वहां रुकना तक जरूरी नहीं समझा और उसके घर से भाग आए।
अब तक की जांच के हिसाब से घायल महिला घर आने के बाद करीब आधा घंटा जीवित रही। इससे पहले आरोपी उसे चंदौसी के निजी अस्पतालों में ले गए थे, लेकिन वहां चिकित्सक कभी इसे पुलिस केस तो कभी परिवार का सदस्य न होने या छोटे अस्पताल में संसाधन न होने की बात कहकर टरकाते रहे। सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन है कि ऐसे मामलों में चिकित्सकों को घायल का इलाज शुरू करके पुलिस को सूचना देनी चाहिए। इलाज समय से मिलने पर महिला की जान बच सकती थी, जबकि इलाज करने में डॉक्टरों पर कोई कार्रवाई नहीं होती। अभी दो अस्पताल नजर में आए हैं। बदायूं एसएसपी को इनके चिकित्सकों व स्टाफ की भूमिका की जांच कराने का निर्देश दिया है। जांच और कार्रवाई बदायूं पुलिस के स्तर से ही होगी। - अविनाश चंद्र, एडीजी बरेली जोन