इस्लामनगर में चल रही रामकथा मेें बोलीं साध्वी प्रज्ञा
भाई की संपत्ति का बंटवारा करने वाला भाई नहीं होता, बल्कि भाई उसे कहा जाता है जो अपने भाई की विपत्ति का बंटवारा करे। यह विचार साध्वी दीदी प्रज्ञा भारती ने इंटर कॉलेज परिसर में चल रही रामकथा में व्यक्ति किए।
उन्होंने कहा कि श्रीराम वन चले गए, लेकिन भरत जी ने अयोध्या की गद्दी स्वीकार नहीं की। उन्होंने राजपाट को यह कहकर ठुकरा दिया कि अयोध्या की संपत्ति का अधिकारी में नहीं हूं, इसके हकदार रघुपति ही हैं। यह कहकर भरत सेवक बनकर चौदह वर्ष तक श्रीराम की पादुकाओं को सिंहासन पर स्थापित कर राज्य का संचालन करते रहे। वर्तमान समय में भाई-भाई में जो प्रेम का भाव हो रहा है, उसका मूल कारण है संपत्ति और स्वार्थ। अगर श्रीराम और भरत की तरह भ्रात प्रेम हो जाए तो सारा विवाद समाप्त हो सकता है। सीता स्वयंवर के प्रसंग के वक्त चेयरमैन वीरेंद्र लीडर ने कथास्थल पर ही पत्नी कमलेश गुप्ता को माला पहनाकर प्रतीकात्मक विवाह की भूमिका का निर्वाह किया।
कार्यक्रम में पधारे सोई शक्तिपीठ के विदेह नंदनी शरण महाराज का नगर पंचायत चेयरमैन वीरेंद्र लीडर, जिला पंचायत सदस्य कुलदीप गुप्ता, योगेंद्र गुप्ता, गौरीश गुप्ता ने स्वागत किया। कथा की व्यवस्था में अतुल वैश्य, प्रमोद रस्तोगी, त्रलोकि नाथ गुप्ता, अजय रस्तोगी, नवीन मित्तल, कृष्ण कुमार मिश्र, संजय चौधरी, वीरेंद्र वीर आदि का सहयोग रहा।