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लॉकडाउन में चौपट हो गया राब का कारोबार

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बदायूं/कादरचौक। कोरोना संक्रमण के चलते लॉकडाउन क्या हुआ, कारोबारों पर तो मानों ग्रहण लग गया। इसमें राब का कारोबार भी शामिल है। कादरचौक में बड़ी तादाद में राब का उत्पादन होता है जो दूसरे प्रांतों में सप्लाई की जाती है। कादरचौक से झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश में माल भेजा जाता है। इस बार राब का अंतरराज्यीय भाव खुलने से पहले ही लॉकडाउन हो गया। ऐसे में बड़े व्यापारियों ने स्थानीय व्यापारियों से जो माल खरीदा था, उसे सुरक्षित रखने के लिए उसको कोल्ड स्टोर में रख दिया है, लेकिन ऐसे में लगभग 84 करोड़ की राब बदायूं समेत आसपास के कोल्डस्टोरेज में कैद है।
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कादरचौक इलाके में 150 के लगभग कोल्हू हैं जिन पर राब बनाई जाती है। कादरचौक समेत आसपास के क्षेत्र समेत कासगंज के किसानों से गन्ना यहां आता है, जिससे राब बनती है। इन कोल्हू वालों से बड़े व्यापारी राब खरीदते हैं और मध्यप्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में भेजते हैं। यहां शराब व अन्य चीजें बनाने में इसका प्रयोग किया जाता है। एक सीजन में एक कोल्हू से लगभग चार हजार क्विंटल राब का उत्पादन होता है। अमूमन नवंबर से मार्च तक चलने वाला सीजन इस बार आगे बढ़ा तो लॉकडाउन ने व्यापारियों की कमर तोड़नी शुरू कर दी। अब व्यापारियों को डर है कि अगर रेट अच्छा नहीं रहा तो आर्थिक नुकसान काफी झेलना होगा। इधर, लॉकडाउन से क्रेशर, कोल्हू मजदूर भी समय से पहले बेरोजगार हो गए।
25 घंटे चलते हैं 150 कोल्हू
कादरचौक में राब के कारोबार का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां लगभग 150 कोल्हू सीजन में 24 घंटे चलते हैं, जहां बड़े बड़े कड़ाहों में राब बनती है। एक कोल्हू में सीजन में औसतन लगभग दो हजार क्विंटल राब का उत्पादन हो जाता है। इसका सीजन नवंबर से मार्च तक माना जाता है। पांच महीनों में यहां कई तीन हजार टन राब का उत्पादन होता है।
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पिछले साल 2800 रुपये प्रति क्विंटल का था रेट
पिछली साल राब का रेट 2800 रुपये प्रति क्विंटल खुला था। इस बार रेट खुलने से पहले ही लॉकडाउन हो गया, जिससे व्यापारी अपना माल बाहर सप्लाई ही नहीं कर पाए। यदि पिछले साल के रेट के अनुसार ही देखें तो प्रति कोल्हू औसतन 56 लाख रुपये की राब का उत्पादन होता है। यदि सभी कोल्हू की राब की गणना करें तो यह लगभग 84 करोड़ बैठता है। मार्च में लगे लॉकडाउन के कारण इस बार राब का रेट नहीं खुल सका, साथ ही माल बाहर जाने पर रोक लग गई।
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उड़ीसा, कर्नाटक में कहा जाता है टीना गुड़
कादरचौक से जिस राब का उत्पादन होता है, उसे टीन के पीपों में भरा जाता है। बाहर तक सप्लाई होते होते यह पीपों में जम जाती है और गुड़ जैसी शक्ल की हो जाती है। इसलिए उड़ीसा कर्नाटक आदि राज्यों में इसे टीना गुड़ भी कहा जाता है।
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बोले व्यापारी
राब के कारोबार को इस बार काफी नुकसान हुआ है। 25 मार्च से कोल्हू, क्रेशर बंद होने के बाद से उत्पादन बंद है। तैयार माल की भी सप्लाई रुक गई है। व्यापारियों ने इसे सुरक्षित रखने के लिए कोल्ड स्टोर में रखा है। कादरचौक गुड़ और राब उत्पादन में बड़ा स्थान रखता है। यहां से कई राज्यों के लिए सप्लाई होती है।
- राममूर्ति लाल गुप्ता, व्यापारी
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कादरचौक में बड़े पैमाने पर राब का उत्पादन होता है। काफी लोगों को रोजगार मिलता है। गन्ना किसानों को समय से भुगतान भी मिलता है। यहां से झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश तक सप्लाई होती थी। इस बार लॉकडाउन में माल सप्लाई नहीं हो सका। कोल्हू, क्रेशर भी समय से पहले बंद हो गए। काफी नुकसान हुआ है।
- अखिलेश शर्मा, व्यापारी
बोले मजदूर
गांव के लोगों को कोल्हू, क्रेशर पर मई तक काम मिलता था। इस बार 25 मार्च से लॉकडाउन के चलते कोल्हू, क्रेशर बंद हो गए। ऐसे में मजदूरों को भी नुकसान हुआ है। समय से पहले कोल्हू, क्रेशर बंद होने से काफी किसानों का गन्ना भी खेतों में खड़ा रह गया है। इससे किसानों को भी नुकसान हुआ है।
- रविंद्र सिंह, मजदूर
स्थानीय मजदूरों को गन्ना के सीजन में कई महीने रोजगार मिलता था। इस बार 25 मार्च से ही काम ठप हो गया। मिलों के लिए होने वाली गन्ना कटाई भी प्रभावित हो गई। ऐसे में काफी मजदूर पहले से बेरोजगार हो गए। अब कोल्हू, क्रेशर फिर से चलने की संभावना नहीं है। व्यापारियों को भी नुकसान हुआ है।
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- विजय सिंह मजदूर
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