गंगा की तराई में 1978 को सीओ समेत पुलिस के तीन जवान हुए थे शहीद
शहीद स्मारक पर पुष्पचक्र अर्पित कर शहीदों को दी श्रद्धांजलि
डाकुओं के साथ सन 1978 में हुई 24 घंटे की मुठभेड़ में गंगा की तराई में शहीद हुए सीओ रामेंद्र पांडे, हेड कांस्टेबल मोहन लाल गौतम और कांस्टेबल रामदास की शहादत को ग्रामीण हर वर्ष नौ जनवरी को शहीद दिवस के रूप में मनाते हैं। सोमवार को तीनों की शहादत में शहीद स्मारक पर एसएसपी महेंद्र नाथ यादव और एसपी सिटी अनिल यादव ने शहीद स्मारक पर परेड कर सलामी दी। एसएसपी यादव ने कहा कि हम पुलिस वालों को उन जवानों की शहादत हमेशा कर्तव्य के प्रति याद दिलाती है। गांव के लोगों को भी प्रशंसनीय योगदान के लिए याद किया जाएगा, जिन्होंने पुलिस के जवानों की शहादत को अपना परिवार मानकर शहीदों के सम्मान में स्थल का निर्माण कराया। इस मौके पर पूर्व प्रधान दिनेश शर्मा ने आभार व्यक्त किया। संचालन प्रबंधक सतीश शर्मा ने किया।
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क्या हुआ था
साल 1978 में नौ जनवरी की बात है। सोमवती अमावस्या के दिन गंगा किनारे लगे मेला में दस्यू सरगना भगवान दास काछी गिरोह को एटा जिले के तत्कालीन सीओ रामेंद्रनारायण पांडे खदेड़ कर ला रहे थे। गिरोह के डाकू गंगा में कूद गए फिर भी उन्होंने पीछा नहीं छोड़ा। गंगा किनारे लगे मेले में भीड़ में गिरोह के कुछ सदस्य गुम भी हो गए थे, फिर भी सीओ ने गिरोह के सरगना का पीछा नहीं छोड़ा। मेला से बाहर निकाल भगवान दास काछी सहित कुछ डाकुओं को गन्ने के खेत में घेर लिया। 24 घंटे चली मुठभेड़ में बदायूं पुलिस के जवान रामदास और मोहनलाल गौतम के शहीद होने के बाद सीओ रामेंद्र नारायण पांडे ने गन्ने के खेत में घुसकर दस्यू को मारने की ठान ली। खेत में घायल पड़े डाकू की गोली सीओ के सीने में लगी फिर भी उन्होंने डाकू को मार डाला। सीओ भी वहीं गिर गए। चूंकि उस दौर में दस्यू सरगना भगवान दास काछी गिरोह का बेहद आतंक था इसलिए तीन जवानों की शहादत से पूरा क्षेत्र सन्न रह गया। उनकी शहादत की याद में गांव के लोगों ने चंदा कर शहीद स्मारक बनवाया। स्मारक के नाम गांव की भूमि भी दान की गई। हर वर्ष नौ जनवरी को स्मारक पर मेला के आयोजन होता है।
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अश्रु पूरित नेत्रों से शहीद रामदास की पत्नी और बेटी ने किया नमन
कादरचौक। शहीद रामदास की पत्नी शीला देवी इकलौती बेटी नीलम और दामाद के साथ शहीद स्थल पर पहुंचीं। वह हमेशा ही पति के स्मारक पर आती हैं। पुष्पचक्र समर्पित करते समय आंखें भर आईं। शहीद की पत्नी को सपने में रामदास ने 1981 में ही कहा था कि मेरा वहां स्मारक बना है। तब से परिवार वाले आते हैं। ग्राम प्रधान महेंद्र सिंह, थानाध्यक्ष रूकुमपाल, अध्यक्ष समीश शर्मा, गिरिराज शर्मा ने शहीद की पत्नी को शॉल भेंटकर सम्मानित किया।
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शहीद पिता का इकलौता पुत्र भी हुआ था शहीद
कादरचौक। शहीद सीओ रामेंद्र नारायण पांडे और दोनों जाबांज सिपाहियों की सूझबूझ ने गंगा किनारे लगे सोमवती के मेले में घुसे डाकुओं को बिना किसी नुकसान के बाहर निकाला था और डाकुओं को मारा। सीओ रामेंद्र नारायण पांडे मूलत: कानपुर देहात के निवासी थे। उनके इकलौते बेटे अनिल पांडे को भी पुलिस की सेवा में गोरखपुर के थाने में तैनाती थी, थानाध्यक्ष के पद पर रहते हुए नदी के उस पार डाकुओं को मारने के लिए नाव से जा रहे थे। नाव बीच नदी में थी। तभी पुलिस से डाकुओं की मुठभेड़ हो गई, जिसमें नाविक को गोली लग गई। पुलिस टीम ने खुद नाव संभाली तभी गोली थानाध्यक्ष अनिल पांडे के भी लग गई। इसमें नाव पलट गई और तीन पुलिस कर्मी और शहीद हुए थे। वर्दी की शान रखते हुए दोनों ही पिता पुत्र कर्तव्य पथ पर शहीद हो गए, जो आज भी पुलिस को उनके कर्तव्यों की याद दिलाते हैं। इन्हीं की शहादतों के कारण आज समाज में पुलिस बल पर गर्व है, जिन्होंने डाकुओं को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया।