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...मैं जब से हाथ में मां के कमाई देने लगा

Sat, 29 Aug 2015 08:47 PM IST
ब्यूरो, अमर उजाला बदायूं
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राष्ट्रीय संरक्षक ने कहा कि संस्कार भारतीय ललित कलाओं के माध्यम सें भारतीय संस्कृति के संरक्षण का कार्य कर रही है। उन्होंने मुंबई में होने वाले कार्यक्रमों की विस्तार से जानकारी दी। इस बीच संस्धा की ओर से उनके सम्मान में काव्य गोष्ठी हुई। प्रदेश के विशेष आमंत्रित सदस्य समाजसेवी अशोक खुराना ने कुछ इस तरह कहा-
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यह शरीर तो दोस्तों, है अवगुण की खान
करना हमें न चाहिए,कभी मीत अभिमान
कवि डॉ. रामबहादुर व्यथित ने कहा-
हे मात्रभूमि के आराधक, जख्मों का शीघ्र निदान करो
संस्कृति का होता हवन आज, हुंकार भरो-प्रस्थान करो
जिला संयोजक प्रदीप रायजादा विशाल ने अपनी बात कुछ इस तरह रखी-
नैतिकता विकलांग हो गई,आदर्श हुए सब खंड-खंड ।
नर मानव ने तोड़ दिए हैैं, मानवता के मेरुदंड
जिला सह-संयोजक कामेश पाठक ने सुनाया-
चाहें और वीरों का बलिदान क्यों न देना पड़े
देश का अखंड मानचित्र होना चाहिए
बदायूं क्लब के सचिव डॉ.अशेष अशेष ने कहा-
गीत दो आज वातावरण के लिए
एक आवाज दो जागरण के लिए
शायर सुरेंद्र नाज ने कुछ इस अंदाज में फरमाया-
मैं जब से हाथ में मां के कमाई देने लगा
कदम-कदम पे मुनाफा दिखाई देने लगा
 शिवाकांत पांडेय ने कहा-
भारत माता के बेटों को दे-दो प्रभु यह वरदान
सोने की चिडिय़ा कहलाए फिर से अपना हिंदुस्तान
इ्रके अलावा कवि अभिषेक अनंत, डॉ.विजय बिंदु, राहुल चौबे, पंकज शर्मा, मनोज सक्सेना, विद्याधर त्रिपाठी, मुनेद्र सक्सेना, डॉ. विष्णु प्रकाश मिश्र,डॉ.मदन मोहन लाल, आर्येंद्र प्रकाश वर्मा, शशांक निशंक, मोहित मिश्र, विष्णु गुप्ता, विवेक खुराना, षट्वदन शंखधार, अतुल अग्निहोत्री आदि थे।
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