बदायूं। जिले में सर्दी का मौसम शुरू होते ही बच्चों में बीमारियों का खतरा बढ़ गया है। खासकर निमोनिया के मामले आने शुरू हो गए हैं। वहीं सरकारी अस्पतालों में बच्चों के लिए अलग से पीडियाट्रिक्स वार्ड मौजूद नहीं हैं। ऐसे में छोटे बच्चों को भी जनरल वार्ड में ही अन्य मरीजों के साथ भर्ती करना पड़ रहा है। बता दें कि बृहस्पतिवार की रात निमोनिया ग्रसित एक बच्चे की मौत हो गई थी। उसे तीन-चार दिन से तेज सर्दी, जकड़न और बुखार की शिकायत थी। परिजन उसका इलाज झोलाछाप से करा रहे थे।
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, जिला अस्पताल में रोजाना 30 से 40 बच्चे इलाज के लिए पहुंच रहे हैं, जबकि जिला महिला अस्पताल में यह संख्या 80 से 90 के बीच दर्ज की जा रही है। अस्पताल प्रशासन का कहना है कि फिलहाल निमोनिया से पीड़ित इस तरह का कोई बच्चा नहीं आया है। जिसको भर्ती किया जा सके।
डॉक्टरों के मुताबिक, तापमान गिरते ही छोटे बच्चे संक्रमण की चपेट में जल्दी आ जाते हैं। इन दिनों खांसी, जुकाम, बुखार और सांस लेने में परेशानी जैसे लक्षण तेजी से बढ़ रहे हैं। ऐसे में इस मौसम में बच्चों की ज्यादा केयर करनी पड़ती है। ताकि बच्चे बीमार न पड़े। वहीं अगर कोई बच्चा गंभीर होता है, तो उसको राजकीय मेडिकल कॉलेज रेफर किया जाता है।
राजकीय मेडिकल कॉलेज में है पीडियाट्रिक्स आईसीयू
जिन मामलों में बच्चों की स्थिति गंभीर होती है या सरकारी अस्पताल में सुविधाएं उपलब्ध नहीं होतीं, उन्हें राजकीय मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया जाता है। बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. कप्तान सिंह का कहना है कि वहां विशेषज्ञ चिकित्सक और आधुनिक उपकरण उपलब्ध होने के कारण गंभीर निमोनिया, न्यूमोनाइटिस या सांस से जुड़ी जटिल स्थिति वाले बच्चों का बेहतर इलाज हो पाता है। जिला व महिला अस्पताल में पीडियाट्रिक्स वार्ड न होने के कारण रेफरल बढ़ जाते हैं। क्योंकि राजकीय मेडिकल कॉलेज में पीडियाट्रिक्स आईसीयू है। ऐसे में वहां पर बेहतर सुविधा बच्चों को मिल सकती है।
महिला अस्पताल में है न्यू बोर्न केयर यूनिट
जिला महिला अस्पताल में नवजात गहन चिकित्सा इकाई (न्यू बोर्न केयर यूनिट) संचालित है, लेकिन यहां पर केवल एक माह से छोटे बच्चों को ही रखा जाता है। इससे बड़े बच्चों को राजकीय मेडिकल समेत हायर सेंटर रेफर किया जाता है, ताकि बच्चों को बेहतर इलाज मिल सके।
जिला अस्पताल में हैं 10 बेड का एनआरसी
जिला अस्पताल में बच्चों के लिए पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) संचालित है। जहां पर गंभीर बच्चों को भर्ती कर इलाज किया जाता है। यहां पर इलाज के लिए अलग से डॉक्टर को तैनात किया गया है। ताकि बच्चों को किसी भी प्रकार की असुविधा न हो।
महिला अस्पताल में नवजात गहन चिकित्सा इकाई तो संचालित है। हालांकि यहां पर एक माह तक के बच्चों को भर्ती कराया जाता है। -डॉ. शोभा अग्रवाल, सीएमएस, जिला महिला अस्पताल बदायूं
यहां पर 10 बेड का एक एनआरसी संचालित है। यहां पर बच्चों को भर्ती किया जाता है और उनका इलाज किया जाता है। -डॉ. अमित वार्ष्णेय, सीएमएस, जिला अस्पताल बदायूं
नौ माह के बच्चे की निमोनिया से मौत की आशंका
- पिछले तीन-चार दिनों से बुखार, सर्दी से था पीड़ित
- झोलाछाप के यहां पर करा रहे थे इलाज
संवाद न्यूज एजेंसी
बदायूं। लखनपुर गांव निवासी योगेंद्र के नौ माह के पुत्र दक्ष को तीन-चार दिन से तेज सर्दी, जकड़न और बुखार की शिकायत थी। वह उसका इलाज शहर में एक झोलाछाप के यहां करा रहे थे। हालात गंभीर होने पर उसे जिला अस्पताल ले गए। वहां पर डाॅक्टरों ने उसको मृत घोषित कर दिया।
परिजनों के अनुसार नौ माह के दक्ष को बीते कुछ दिनों से तेज सर्दी, जकड़न और बुखार की शिकायत थी। शुरुआत में परिवार ने इसे सामान्य मौसमी बीमारी समझकर स्थानीय स्तर पर इलाज कराने का प्रयास किया। इसी दौरान वे बच्चे को शहर के लालपुल के पास एक झोलाछाप के पास लेकर पहुंचे। झोलाछाप ने बच्चे को कुछ दवाइयां दीं, लेकिन स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। उल्टा, मासूम की हालत धीरे-धीरे और गंभीर होती चली गई।
परिजनों का कहना है कि बच्चे को सांस लेने में दिक्कत बढ़ने लगी। शरीर ठंडा होने लगा। बच्चा लगातार कमजोर होता गया। घबराए परिजन उसे जिला अस्पताल लेकर पहुंचे। वहां डॉक्टरों ने बच्चे की जांच की, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। डॉक्टर ने उसे मृत घोषित कर दिया। डॉक्टरों का कहना है कि समय पर सही उपचार मिलता तो शायद बच्चे की जान बचाई जा सकती थी। घटना के बाद परिवार में रो-रोकर बुरा हाल है।
झोलाछाप के नाम पर विभाग खामोश
जिले में स्वास्थ्य विभाग की सरपरस्ती में जमकर झाेलाछापों की दुकान चल रही है। शहर से लेकर देहात तक में इन झोलछापों का नेटवर्क काफी तगड़ा है। पहले तो कोई अधिकारी छापा मार कार्रवाई करता नहीं है। अगर छापा मारने जाता भी है तो पहले उनको जानकारी दे दी जाती है। यही वजह है कि वह अपना बोर्ड आदि उतारकर दुकानों को बंद करके भाग जाते हैं। इससे वह कार्रवाई की जद में आने से बच जाते हैं। अगर कोई गलती से पकड़ भी जाए तो इस तरह से रिपोर्ट लगाई जाती है कि झोलाछाप आसानी से बच निकलता है।
जिला अस्पताल में स्थित एनआरसी।संवाद- फोटो : सांकेतिक