बाल व्यास पंडित राधा अग्निहोत्री।
उसावां। जोरावर महाराज आश्रम (देवस्थान ) पर पंचकुंडीय श्री लक्ष्मी नारायण महायज्ञ एवं श्रीमद्भागवत कथा में बाल व्यास कथावाचिका पंडित राधा अग्निहोत्री ने महर्षि भृगु एवं भगवान विष्णु के साथ ज्ञान-वैराग्य व नारद भक्ति की कथा सुनाई।
रविवार सुबह 10 बजे से 12 बजे तक यज्ञाचार्य पंडित उमाशंकर तिवारी ने यजमानों को यज्ञ की वेदी के समक्ष बैठाकर यज्ञ किया। शाम तीन बजे वृंदावन से पधारीं बाल व्यास पंडित राधा अग्निहोत्री ने कहा कि एक बार सरस्वती नदी के किनारे तट पर ऋषियों ने यज्ञ आयोजित किया। तभी वहां पर ऋषियों में विवाद छिड़ गया कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश में सबसे महान कौन है। इसे तय करने के लिए महर्षि भृगु को त्रिदेवों की परीक्षा लेने भेजा गया।
सबसे पहले ब्रह्मलोक गए और ब्रह्माजी को प्रणाम नहीं किया। इस पर ब्रह्माजी क्रोधित हो गए, इसके बाद कैलाश पर्वत गए जहां पर महर्षि भृगु को देखकर शिव प्रसन्न हो गए, लेकिन भृगु ऋषि ने उनका अपमान कर दिया। इसके बाद बैकुंठ धाम पहुंचे, जहां पर शेषनाग की शैया पर भगवान विष्णु सो रहे थे, माता लक्ष्मी उनके पैर दबा रही थीं। भृगु ऋषि ने पहुंचते ही भगवान विष्णु के वक्षस्थल (छाती) पर जोरदार लात मारी। लात लगते ही भगवान विष्णु एक दम उठे और क्रोध करने के बजाए महर्षि के पैर पकड़ लिए। कहा कि मेरा वक्ष बहुत कठोर है, चोट तो नहीं लगी। इसके बाद उन्हें यह ज्ञान हुआ कि भगवान विष्णु ही श्रेष्ठ हैं।
इस कथा के बाद बाल व्यास ने ज्ञान वैराग्य नारद भक्ति की कथा सुनाई। इस दौरान श्रोतागणों ने मंत्रमुग्ध होकर कथा का श्रवण किया। कार्यक्रम में देवस्थान के महंत राघवदास महाराज, धनमेश कश्यप, पवन कुमार गुप्ता के साथ अन्य लोगों का विशेष सहयोग रहा।