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...पीने लायक नहीं छोड़ेंगे गंगाजल

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मानो तो मैं गंगा मां हूं, न मानो तो बहता पानी... फिल्म गंगा की सौगंध के गीत के ये बोल जब भी गूंजते हैं, तब-तब जेहन में ये सवाल उठता है कि आस्था के नाम पर जीवनदायनी से हो रहा खिलवाड़ कब तक चलेगा? गंगा में ज्यादातर लोग कचरा बन चुकी हवन-पूजन सामग्री बहाते मिलेंगे। आस्था की डुबकी लगाते वक्त कुल्ली मारना भी गलत है, लेकिन लोग वाहन तक गंगा में धोने से गुरेज नहीं कर रहे। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि गंगाजल पीने लायक बचेगा?
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कछला गंगाघाट पर बहती धार में वाहन धोने का नजारा देखने को मिला, तो उन तमाम लोगों की आत्मा कचोटने लगी जो गंगा की पवित्रता को लेकर विरोध में कुछ भी सुनना नहीं चाहते। जीवनदायनी में वाहन धोने से पुण्य अर्जित नहीं हो सकता। गंगा में नहलाए गए वाहन का कभी एक्सीडेंट नहीं होगा, ऐसा सोचने वाले पुण्य कम बल्कि पाप ज्यादा कर रहे हैं। गलत तो हर वह चीज है, जो प्रवाहित करने पर गंगा में प्रदूषण बढ़ाए। तभी तो संत-महात्माओं ही नहीं बल्कि अविरल और निर्मल गंगा अभियान से जुड़े लोगों ने जागरूकता का संदेश देकर कचरा प्रवाहित करने की बजाय उसे घाट पर गड्ढा खोदकर दफन करने पर जोर दिया। केंद्र सरकार की नमामि गंगे योजना भी किसी एक की वजह से सफल नही हो सकती। इसके लिए हर किसी को भागीरथ बनना पड़ेगा।

उमा भारती के संदेश का साक्षी है कछला घाट
उझानी। केंद्र में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में एनडीए की सरकार बनने से पहले मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने गंगोत्री से गंगा सागर तक अविरल गंगा-निर्मल गंगा अभियान चलाया था। उनका एक पड़ाव कछला गंगाघाट पर रहा। बदायूं, कासगंज और एटा के लोग भी उनके साथ थे। संकल्प श्रद्धालुओं को भी गंगा की पवित्रता बनाए रखने का दिलाया लेकिन जीवनदायनी में वाहन धोने से लगता नहीं कि कचरा बहाने वालों पर ज्यादा असर पड़ा हो।
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संत समाज एकजुट होना चाहिए
कछला गंगाघाट से संत-महात्माओं का एक बड़ा हिस्सा ताल्लुक रखता है। प्रमुख संतों में से बाबा हरीओम दास शर्मा कहते हैं कि गंगा में वाहन धोने पर पूर्ण प्रतिबंध लगना चाहिए। हालांकि यह काम पुलिस और प्रशासन के जिम्मे हो, लेकिन संत समाज एकजुट होकर ऐसे लोगों का विरोध शुरू कर दे तो सार्थक नतीजा सामने आने लगेगा।
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