कांवडिय़ों का रेला देखने उमड़ी भीड़
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सोमवार को भोले के जलाभिषेक के लिए कछला से गंगाजल लेकर कांवडिय़ों की जिले की सभी सड़कों पर रेला चला। ट्रेक्टर ट्रालियों में शिव और तमाम देवी देवताओं के स्वरूप और शिवगणों को देखने के लिए रास्तों में ग्रामीणों का हुजूम लगा रहा। स्वागत सत्कार भी किया गया। डीजे स्वरूपों का नृत्य और कांवडिय़ों की मस्ती देखने रास्ते के गांवों में लोग घरों से निकल सड़कों पर थे। कई जगह जाम की स्थिति बन गई। कांवड़ यात्रा को देखते हुए पुलिस की व्यापक व्यवस्था की गई थी।
बगरैन। पुराने भोलानाथ मंदिर पर सावन में शिवभक्तों एवं कावरियों की भीड़ उमड़ती है। मान्यता के अनुसार यहां पर सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद पूरी होती है। करीब तीन सौ वर्ष पहले वजीरगंज के स्वर्गीय सेठ बिहारी लाल के पूर्वजों नें एक प्याऊ की स्थापना करवाई थी। इनके दादा रामसुखदास जी जमींदार थे।
इतिहास में जब बदायूं-चदौसी के लिए कच्ची सड़क थी। पैदल राहगीर कुएं का शीतल जल पीकर नीम पीपल के विशाल वृक्ष की छांव में विश्राम करते थे। वहीं एक खेड़ा था, यह वेटोर गांव के उजडने पर बना था। प्याऊ पर भोला नाथ नाम के सिद्धपुरुष ने आकर अपनी कुटिया बनाई थी। भगवान शंकर के अनन्य भक्त भोलानाथ का कुछ समय बाद निधन हो गया तो उनका अंतिम संस्कार इसी खेड़े पर कर दिया।
किवदंती है कि इस क्षेत्र से कोई चोरी करके निकलता तो सिद्धपुरूष सफेद कपड़ो में खड़ाऊ पहने दिखते थे, जिससे डरकर चोर क्षमा याचना कर और कभी चोरी नहीं करने की बात कहते सामान छोड़कर चले जाते। इससे भोला नाथ की मान्यता दिन-प्रतिदिन बढ़ती गई। बेटोर के खेड़े पर सिद्धपुरुष का देव स्थान बनाकर पूजा अर्चना हर सोमवार को होने लगी। वहां पर अब भव्य बाबा भोला नाथ के मंदिर पर शिव त्रयोदशी एवं सावन के हर सोमवार को जल चढ़ाकर मनौती मांगते है।