जिला पंचायत के एएमए हरिपाल सिंह ने बताया कि झंडी पहुंचने तक सभी प्रमुख व्यवस्थाएं पूरी कर ली जाएंगी। लाइट की काम चलाऊ व्यवस्था हो जाने के बाद से दिन रात यहां व्यवस्थाओं को सुधारा जा रहा है। इंजीनियर संजय कुमार ने मेला ककोड़ा स्थल का दौरा कर बताया कि सभी काम पिछले वर्षों से एडवांस में चल रहे हैं। घाट के संबंध में बाढ़ खंड के एक्सईएन से पानी के बारे में बात की जा रही है। 17-18 नवंबर को घाट काटने का काम तब होगा जब यह सुनिश्चत हो जाएगा कि गंगा में और तो पानी नहीं आएगा। वीआईपी और बरेली-पीलीभीत बस्ती के लिए बाईपास के निर्माण समेत प्रमुख मार्गों का निर्माण कर दिया गया है। पानी के छह टैंकर डीएम के आदेश पर मिले हैं, जिनसे छिड़काव कराकर सड़कों की मिट्टी को मजबूत किया जा रहा है।
इसी क्षेत्र में मेला लाने का प्रयास हुआ सार्थक
करीब तीन दशक पूर्व कांग्रेस के तत्कालीन मंत्री यहां से मेला उझानी के पास पलिया ले गए थे। तब नूरपुर के प्रधान छम्मन मियां और ककोड़ा के पंडित सोहनपाल मुखिया ने मेला को पुन: उसी स्थान पर लाने के लिए हाईकोर्ट में लड़ाई लड़ी। कोर्ट के उसी आदेश से मेला ककोड़ा पुन: इस क्षेत्र में लग रहा है। मेला के लिए हाईकोर्ट तक लड़ाई लडने वाले लोगों के परिवारी इस बात से आहत हैं कि जिला पंचायत इस मेला को भव्य रूवरूप नहीं दे पा रहा है। और हर साल इसकी भव्यता में गिरावट हो रही है। गंगा स्नान और सामान्य रूप से चाट पकौड़ी खाने तक सीमित हो रहे इस प्रसिद्ध मेला का औचित्य कछला गंगा घाटों की तरह ही हो जाएगा तो इसकी भव्यता की पहचान ही कहां रह पाएगी। मेला गंगा जमुनी तहजीब का संगम माना जाता है। छम्मन मियां के पुत्र मुहम्मद अहमद उर्फ लल्ला बाबू, वहीं सोहनपाल मुखिया के पौत्र ओमशंकर शर्मा ने कहा है कि मेला में पहले तमाम प्रदर्शनी, मनोरंजन के साधन, ज्ञान बर्धक कार्यक्रम आयोजित होते थे। भव्य द्वार बनते थे। कालांतर में मेला में गिरावट हो रही है। इसे गंगा स्नान पर्व के रूप मात्र में रह जाने दिया गया है। महंत परमात्मादास ने सलाह दी है कि मेला में देवी के रूप में झंडी को उचित स्थान मिलना चाहिए ताकि मेला समाप्ति तक झंडी सुरक्षित रहे और अंत में उसे विधिवत प्रवाहित कराए जाने की व्यवस्था हो।