तीन दिन पहले वजीरगंज में हाईवे पर साले बहनोई की जिस कार में जिंदा जलकर मौत हुई, उसमें एलपीजी गैस किट लगी थी। किट सुरक्षित नहीं थी, शायद तभी हादसे के बाद गाड़ी आग का गोला बन गई जिसमें दो लोगों की जान चली गई और मासूम बच्चे ने किसी तरह कूदकर जान बचाई। अवैध किट और रीफिलिंग जान जोखिम की वजह बनी है। ऐसे कई वाहन जिले की सड़कों पर दौड़ रहे हैं जो मामूली हादसे या चिंगारी से बम बन जाते हैं। शहर में अवैध तरीके से गैस रीफिलिंग का काम जोरों पर चल रहा है। जिले में लालपुल पर एलपीजी रीफिलिंग का एकमात्र सेंटर दास ऑटो के पास है। हालांकि जिले भर में एलपीजी गैस किट लगाने का कोई मान्यता प्राप्त सेंटर नहीं है। आरटीओ से अधिकृत बरेली के ही आरएफसी (रेट्रो फिटनेस सेंटर) से पास होकर एलपीजी किट लगाई जाती हैं जिसके बाद संबंधित वाहन चालकों को स्थानीय दास फिलिंग सेंटर से उसमें गैस डलवानी चाहिए। सरकारी औपचारिकता निभाकर गैस किट लगवाने और फिलिंग सेंटर से मिलने वाली महंगी गैस डलवाने से लोग बचते हैं और उन्होंने इसके आसान शार्टकट खोज लिए हैं। शहर समेत जिले भर में कई धंधेबाज बैठ गए हैं जो किसी भी तरीके की गैस किट लगा देते हैं। यह किट विभाग से वैध भले ही न हो पर देखने में बिल्कुल असली की तरह ही होती है। बारीकी से जांच करने पर ही पता लग पाता है कि यह किट अवैध है। यह कम कीमत में तो लग जाती है पर हल्का होने की वजह से कभी भी फट सकती है।
70 रुपये किलो में होती है रीफिलिंग
शहर में अवैध तरीके से गैस रीफिलिंग का बड़ा कारोबार है। हाईवे किनारे लालपुल तिराहा, नवादा, शहबाजपुर, दातागंज रोड पर क्रॉसिंग के पास गैस रीफिलिंग की कई दुकानें हैं। यहां साठ से सत्तर रुपये किलो के हिसाब से घरेलू एलपीजी सिलेंडरों से गैस किट वाले सिलेंडर में गैस ट्रांसफर की जाती है। ग्राहक की जरूरत या रात के हिसाब से इस रेट को धंधेबाज और भी बढ़ा लेते हैं। शहर के दूसरे हिस्सों में कबूलपुरा, नई सराय, गद्दी चौक, मंडी से होकर गुजर रहे ककराला रोड पर भी दुकानों में गैस रीफिलिंग होती है। प्रशासन से लेकर पूर्ति विभाग तक के अधिकारी कभी इस पर ध्यान नहीं देते। चर्चा है कि हर विभाग के कुछ कर्मचारी महीने में एकाध बार इन दुकानों पर मंडराते देखे जा सकते हैं। कई बार खानापूरी के लिए अभियान भी चलाया जाता है, कुछ दिन दुकानें बंद रहती हैं और फिर खुल जाती हैं।
स्टेपनी की तरह बना दी है गैस किट
अब तक वाहनों की गैस किट में लंबे और गोल सिलेंडर लगाए जाते थे। इनमें से गोल सिलेंडर बदायूं जिले में वैध नहीं हैं। चेकिंग के दौरान अक्सर यह पकड़ जाते हैं। इसलिए जांच टीम को गच्चा देने के लिए धंधेबाजों ने स्टेपनी की शक्ल में गैस किट बना ली है। गाड़ी के अंदर देखने पर आभास होता है कि वहां स्टेपनी रखी है और गाड़ी पेट्रोल या डीजल से ही चल रही है। जबकि स्टेपनी की तरह दिखने वाली गैस किट के नीचे से इंजन तक तांबे की पतली वायर निकलती है।
जिले में गैस किट लगाने के लिए कोई अधिकृत मैकेनिक नहीं है। बरेली आरएफसी से ही वैध गैस किट लगाई जाती है। वाहन चालकों को अधिकृत फिलिंग सेंटर से ही गैस डलवानी चाहिए। वाहनों में अवैध गैस किट लगाना काफी खतरनाक हो सकता है। इसकी जांच को जिले भर में अभियान चलाया जाएगा।
- एनसी शर्मा, एआरटीओ प्रशासन