मंडल के प्रमुख मेलों में शुमार नेता झुकसा का मेला प्रांगण दुकानदारों और खेल-तमाशे वालों से पूरा भर गया है। ज्येष्ठ पूर्णिमा 20 जून को मेला का प्रमुख पर्व है।
बरेली मार्ग पर नेता गांव में देवी मंदिर पर साल में क्वार, चैत्र और ज्येष्ठ पूर्णिमा पर मेला लगता है। ज्येष्ठ में लगने वाले मेला का विशेष महत्व है। जिला पंचायत के अधीन लगने वाला यह मेला सात दिनों तक चलता है। इस मेले में प्रदेश के अलावा अन्य राज्यों के व्यापारी और खेल तमाशे वाले आते हैं। महिलाओं और किसानों के लिए इस मेले में काफी सामान मिलता है। मेला परिसर के करीब में पशु नखाशा भी लगता है। वर्तमान में मेला परिसर पूरी तरीके से सज चुका है।
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पेड़ों की शाखाएं काटने पर नोकझोंक
दातागंज। दुकानों के तंबुओं में अवरोध बनने पर व्यापारियों ने पेड़ों की शाखाएं काट डालीं। इस पर गांव वाले उत्तेजित हो गए। गांव वालों का कहना है कि मुश्किल से पेड़ तैयार होते हैं। हम दिन रात इनकी सेवा करते हैं। मेला प्रबंधन ने पेड़ न काटने देने का आश्वासन देकर ग्रामीणों को शांत किया।
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इसलिए महिलाओं में है मंदिर की मान्यता
दातागंज। नेता झुकसा का मेला खासकर महिलाओं का माना जाता है। देवी मंदिर में मांगी जाने वाली मन्नते पूरी होती हैं। ऐसा लोगों में विश्वास है। मेला के कारण आसपास के गांवों में मेला से पहले ही आकर यहां ठहर जाते हैं। 10 किमी के दायरे मेें कोई भी गांव ेसा नहीं मिलेगा जहां लोगों के घरों में रिश्तेदार न रुके हों।
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ऐतिहासिक है नेता झुकसा का नेत कुंवरि मंदिर
दातागंज। रोहिलों ने युद्ध में पराजित होने के बाद राजकुमारी नेत कुंवरि का सिर काट लिया था। राजकुमारी की याद में नेता गांव में मंदिर की स्थापना हुई। रोहिले इनका सिर नेपाल ले गए थे। वहां भी मंदिर बना हुआ है। खुद को नेत कुंवरि का वंशज बताने वाले नेता गांव के हरपाल सिंह रेकवार ने बताया कि करीब 1600 साल पूर्व अयोध्या के राजा नरहरि अपनी पुत्री नेतकुंवरि और फौज के साथ जूनागढ़ वर्तमान में झुकसा के निकट से गुजर रहे थे। उस समय यहां बीहड़ जंगल था। नरहरि की फौज पर पड़ोसी जूनागढ़ जो वर्तमान में दियूनी गांव बोला जाता है। यहां के रोहिलों ने नरहरि की फौज पर हमला कर दिया। रोहिलों का उद्देश्य राजकुमारी नेत कुंवरि का अपहरण करना था। राजकुमारी और राजा ने वीरता पूर्वक रोहिलों को सामना किया और उन्हें परास्त कर दिया। लेकिन बाद में बादोंगढ़ (बदायूं) की फौज के सहयोग से रोहिलों ने नरहरि को बंदी बना लिया। इसके बाद में राजकुमारी युद्ध करती रहीं। युद्ध में रोहिलों ने इनका सिर काट लिया। सिर लेकर नेपाल चले गए। नेपाल के काठमांडू शहर में आज भी उस जगह पर इनका मंदिर बना हुआ है, जहां रोहिलों ने इनका सिर रखा था। अपनी मौत के बाद नेत कुंवरि ने अपने सभी लोगों को स्वप्न में निर्देश दिया कि इसी जंगल में बस जाओ। हरपाल के मुताबिक आसपास के 12 गांवों में रेकवार ठाकुर बसते हैं। यह सभी अपने को नेत कुंवरि के वंशज मानते हैं। उन्हें देवी के रूप में पूजते हैं।