होली पर निकलने वाले हुड़दंगियों के जुलूस को निकलते हुए 65 साल हो गए हैं। इस दरमियान जुलूस के स्वरूप में भी बदलाव आया है। छह दशक के बाद जुलूस में व्यवस्थाओं की कमान भी तीसरी पीढ़ी के पास आ गई है। खासियत यह है कि जुलूस में या जुलूस को लेकर कभी कोई विवाद नहीं हुआ।
आजादी के तीन साल बाद 1950 में आनंद रस्तोगी और विद्याराम पहली बार हुरियारों की टोलियों को साथ लेकर निकले। शुरू के सालों में जुलूस में दो-चार ठेले हुआ करते थे। वक्त के साथ जुलूस विशाल होता गया। जुलूस में हाथी, घोड़े और ऊंटों को भी शामिल किया जाता था लेकिन, अब हाथी और ऊंट मिलते ही नहीं। अबीर-गुलाल और टेसू के फूलों की जगह रसायनिक रंगों ने ले ली है। जुलूस की कमान अब अवनेश वर्मा, महेंद्र वर्मा और अजयपाल के हाथों में है। इस बार भी जुलूस की तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। जुलूस में काली अखाड़ा और कई आकर्षक झांकियों को भी शामिल किया गया है।
समय के साथ कुछ बदलाव तो होते ही हैं। हम संतुष्ट इस बात से हैं कि जुलूस को 65 साल हो गए हैं। कभी किसी तरह का कोई विवाद नहीं हुआ।
- अवनेश वर्मा
हुड़दंगियों का जुलूस अब पहले के मुकाबले काफी बड़ा हो गया है। समय के साथ जुलूस का स्वरूप बदलना स्वाभाविक बात है। यह होना भी चाहिए।
- नितिन
जिम्मेदारियां अब युवाओं के कंधों पर आ रही हैं। बुजुर्गों के मार्गदर्शन में काम हो रहा है। कुछ बदलाव समय के साथ जरूर हुए हैं, लेकिन जुलूस का मिजाज वही है।
- अमित वर्मा
जुलूस का वह दौर भी देखा था जब हुड़दंगी ऊंट-घोड़ों और हाथी पर बैठ कर निकलते थे। अब हाथी-ऊंट नहीं दिखते। हुड़दंगियों का मिजाज भी वैसा नहीं रहा है।
- महेश शर्मा
सभी के सहयोग से यह संभव हुआ है कि 65 साल पुरानी परंपरा कायम है। जिम्मेदारियां जरूर पीढ़ी दर पीढ़ी बदलती रही हैं, लेकिन स्वरूप वही है।
- अजयपाल
शराब का चलन बढ़ने से जुलूस का मिजाज बदला हुआ नजर जरूर आता है, लेकिन कभी किसी तरह का कोई विवाद नहीं हुआ है। 65 साल का सफर छोटा नहीं होता।
- महेंद्र वर्मा