गंगा किनारे शौच के लिए जाते हैं रामसहाय नगला के लोग
स्वच्छ भारत मिशन। नमामि गंगे योजना। कादरचौक ब्लाक क्षेत्र के रामसहाय नगला गांव के लिए सारी योजनाएं और अभियान बेमानी हैं। गरीबी और बदहाली यहां के लोगों की नियति बन गई है। खास बात यह है कि रामसहाय नगला गांव में अब तक एक भी शौचालय नहीं बना। यह पूरा का पूरा गांव गंगा किनारे खुले में शौच करने जाता है। जबकि केंद्र से लेकर प्रदेश सरकार तक शौचालय बनाने पर पूरा जोर दे रही हैं। पूरा प्रशासनिक अमला इस कार्य में जुटा है। गांवों को ओडीएफ बनाने के लिए नोडल अधिकारी नियुक्त किए गए हैं। शौचालय बनाने के नाम पर सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। हकीकत यह है कि शौचालय निर्माण और गांवों को ओडीएफ बनाने का ज्यादातर काम कागजों में है।
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आबादी एक हजार, शौचालय एक भी नहीं।
सदर तहसील क्षेत्र के ब्लाक कादरचौक ब्लाक का गांव रामसहाय नगाल गंगा के बांध से मात्र 20 मीटर दूरी पर बसा हे। यहां की आबादी लगभग एक हजार है। अब तक इस गांव में एक भी शौचालय नहीं बना। यहां न तो कोई खुद बनवा सका और न ही किसी को सरकारी मदद मिल सकी। शौचालय तो छोड़िए यहां नाली, खड़ंजा तक नहीं हैं। न ही यहां की किसी महिला को गैस कनेक्शन मिला।
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गंगा किनारे शौच को जाते हैं गांव वाले
दिन सोमवार। समय सुबह सात बजे। रामसहाय नगला पहुंचे अमर उजाला प्रतिनिधि ने देखा तो गांव की महिलाएं, लड़कियां, बच्चे, बड़े, बूढ़े सब एक-दो करके गंगा की तरफ आ जा रहे थे। कोई लोटा लेकर जा रहा था, किसी के पास पानी भरा डिब्बा और कोई खाली हाथ था। ये सब वे लोग हैं, जो रोजाना गंगा किनारे खुले में शौच करने जाते हैं।
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रामसहाय नगला की अनारकली कहती हैं महिलाएं और लड़कियां गांव से ज्यादा दूर नहीं जा सकते। गंगा गांव के पास बह रही हैं। इसलिए गंगा किनारे शौच जाना मजबूरी है।
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यहां की हरप्यारी कहती हैं कि ज्यादातर परिवार झोपड़ियों में गुजारा करते हैं। एक-दो लोग मुश्किल से पक्का मकान बनवा पाए। मेहनत मजदूरी करके पेट पालें कि शौचालय बनवाएं। सरकार भी ध्यान देती नहीं है।
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भगवान देवी का परिवार पालेज की खेती करके गुजारा करता है। वह कहती हैं नेता वोट मांगने तो आ जाते हैं। सरकार बनने के बाद हम गरीबों की ओर मुड़कर कोई नहीं देखता। अपना तो गंगा में ही बसेरा हैं।
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जनदेवी कहती हैं कि नेता हो या अधिकारी आज तक कोई गांव में देखने नहीं आया। सरकार जो देती है बड़े, बड़ों का ही पेट नहीं भरता। गरीबों की कौन सुने? घर में शौचालय नहीं है ऐसे में गंगा किनारे शौच के लिए जाना पड़ता है।
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वर्जन
शौचालय के लिए अब तक बजट ही नहीं मिला तो कहां से बनवाएं? कई अधिकारियों से कह चुके हैं। मगर कोई सुनने वाला ही नहीं है।
-सुनीता देवी, ग्राम प्रधान
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गांव वालों के खाते खुलवाए जा रहे हैं। मैं तो अभी आया हूं। पहले के लोग क्या कर गए मुझे नहीं मालूम। बैंक खाते खुलने के बाद शौचालय निर्माण को रकम भेज दी जाएगी।
- मुनीश कुमार, ग्राम विकास अधिकारी
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मुझे आए भी आठ दिन हुए हैं। इसलिए मैं कुछ नहीं कह सकता। किस गांव की स्थिति क्या है जल्द दिखवाया जाएगा। शौचालयों का निर्माण तो हर गांव में होना है।
- बलवंत सिंह, बीडीओ