बदायूं। आजादी की लड़ाई में बदायूं की भूमिका सिर्फ स्थानीय आंदोलनों तक सीमित नहीं रही, बल्कि यहां के क्रांतिकारियों ने राष्ट्रीय स्तर पर चल रहे अभियानों में भी अग्रणी योगदान दिया। महात्मा गांधी के नेतृत्व में मार्च 1930 में शुरू हुए नमक सत्याग्रह की गूंज जब बदायूं पहुंची तो यहां के स्वतंत्रता सेनानियों ने गुलड़िया गांव को आंदोलन का केंद्र बनाया।
महात्मा गांधी ने बदायूं के प्राचीन गुरुकुल महाविद्यालय में नौ नवंबर 1929 को क्रांतिकारियों को संबोधित किया। उनके जोशीले भाषण ने यहां के युवाओं और स्वतंत्रता सेनानियों को गहराई से प्रभावित किया। कुछ ही महीनों बाद 12 मार्च 1930 को गांधीजी ने डांडी यात्रा की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य अंग्रेजों के नमक कानून को तोड़ना था। बदायूं के स्वतंत्रता सेनानियों ने विचार-विमर्श के बाद तय किया कि जिले में यह आंदोलन ऐसे स्थान पर होना चाहिए।
जहां महिलाओं की भागीदारी सहज हो और अंग्रेजी सैनिकों से सुरक्षा भी मिल सके। काफी सोच-विचार के बाद दातागंज रोड पर शहर से करीब छह मील दूर स्थित गुलड़िया गांव को आंदोलन का मुख्य केंद्र बनाया गया। निर्धारित दिन पर अंग्रेज सैनिकों की नजर से बचते हुए हजारों लोग गुलड़िया पहुंचे। उस समय करीब 6,000 लोग वहां पर एकत्र हुए थे। धीरे-धीरे यह संख्या बढ़कर लगभग 15,000 तक पहुंच गई। इसमें न केवल बदायूं जिले के लोग थे, बल्कि बरेली, मुरादाबाद, पीलीभीत, शाहजहांपुर और बिजनौर जैसे आसपास के जिलों से भी क्रांतिकारी और आमजन पहुंचे। संवाद