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तीन सौ साल के इतिहास में पहली बार नहीं लगेगा ककोड़ा मेला

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बदायूं/कादरचौक। रुहेलखंड के मिनी कुंभ के नाम से प्रसिद्ध ककोड़ा मेला का आयोजन पहली बार नहीं होगा। कोरोना संक्रमण के खतरे के मद्देनजर शासन से आयोजन की अनुमति नहीं मिली है। शनिवार को ककोड़ा गंगा घाट पर झंडी पूजन प्रस्तावित था। इसे भी रद्द कर दिया गया। अब 30 नवंबर को कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा पूजन किया जाएगा। जानकारों के मुताबिक करीब 300 साल के इतिहास में पहली बार मेला ककोड़ा का आयोजन नहीं हो रहा है।
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कादरचौक थाने के अंतर्गत गांव ककोड़ा के पास गंगा तट पर हर साल कार्तिक माह में मेला ककोड़ा का आयोजन किया जाता है। मेला में व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी जिला पंचायत की होती है। मेला की अनौपचारिक शुरुआत कार्तिक माह की सप्तमी से हो जाती है। सप्तमी के दिन ककोड़ा देवी मंदिर से गंगा तट पर झंडी लाई जाती है। यहां झंडी का पूजन होता है। शनिवार को कार्तिक माह की सप्तमी पर झंडी पूजन की रस्म भी नहीं निभाई गई। कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष सप्तमी से कृष्ण पक्ष अष्ठमी तक करीब 15 दिन चलने वाले मेला ककोड़ा में गंगा तट पर साधु-संत और श्रद्धालु तंबुओं के अस्थायी शहर में कल्पवास करते हैं। कार्तिक पूर्णिमा पर यहां लाखों भक्तों की भीड़ उमड़ती है। इस बार मेला के आयोजन को लेकर पहले से संशय बना हुआ था। शनिवार को इस पर स्थिति साफ हो गई। जिला पंचायत ने भी साफ कर दिया है कि इस बार मेला ककोड़ा का आयोजन नहीं किया जाएगा।
मेला ककोड़ा का इतिहास करीब 300 साल पुराना है। बताते हैं कि मेला का आयोजन मुगल सल्तनत के समय से होता आ रहा है। कोरोना के कारण यह पहली बार है कि गंगा तट पर मिनी कुंभ का आयोजन नहीं किया जा रहा है। जिला पंचायत ने मेला के आयोजन से इंकार कर दिया है।
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प्रभावित होगा करोड़ों का व्यापार, हजारों हाथों से छिना रोजगार
रुहेलखंड के मिनी कुंभ मेला ककोड़ा की तैयारियां एक महीने पहले शुरू हो जाती थीं। गंगा किनारे कटरी की जमीन समतल करने से लेकर यहां तंबुओं का शहर बसाने, घाट बनाने, लाइटिंग, अस्थायी सड़कें बनाने आदि कामों में सैकड़ों की संख्या में मजदूर लगाए जाते थे। हजारों की संख्या में ठेला-खोमचा, खेल-तमाशे, दुकानदारों को भी मेला में अच्छी आमदनी होती थी। कटरी के ग्रामीण एक साल तक मेला का इंतजार करते थे। मिट्टी के बर्तन, चूल्हे आदि की भी यहां खूब बिक्री होती थी। इस बार मेला का आयोजन न होने से हजारों हाथों से रोजगार छिन गया है। ऐसे में लोग मायूस हैं।
साधु-संत बोले-गंगा किनारे कल्पवास की अनुमति मिले
कार्तिक माह में मेला ककोड़ा में गंगा किनारे हर साल काफी संख्या में साधु-संत कल्पवास के लिए पहुंचते थे। पहली बार मेला का आयोजन न होने से साधु-संत भी मायूस हैं। उनका कहना है कि साधु-संतों को कार्तिक माह में गंगा किनारे कल्पवास की अनुमति मिलनी चाहिए। जब सभी तरह के आयोजन हो रहे हैं तो मेला ककोड़ा पर पाबंदी सही नहीं है। कार्तिक पूर्णिमा का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। सरकार को कल्पवास को लेकर कोई वैकल्पिक व्यवस्था बनानी चाहिए।
जन के लिए शासन को लिखा गया था। अब तक अनुमति नहीं मिली है। राजघाट समेत कई स्थानों पर इसी तरह के आयोजन होते हैं वहां भी आयोजनों पर सरकार ने रोक लगा दी है। कोविड-19 के दृष्टिगत इस वर्ष जिला पंचायत की ओर से इस बार मेला ककोड़ा का आयोजन नहीं किया जाएगा। कार्तिक पूर्णिमा स्नान पर्व भी नहीं मनाया जाएगा। कार्तिक पूर्णिमा पर गंगा पूजन समेत अन्य औपचारिकताओं को ही पूरा किया जाएगा। श्रद्धालुओं को भी चाहिए कि वह कोविड-19 के दृष्टिगत गंगा तट पर न जुटें। - सत्यपाल, एएमए जिला पंचायत
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