शहर में विजय नगर कालोनी निवासी कवि मित्र ने धार्मिक काव्य संग्रह श्रद्धार्चन की प्रस्तुति के बाद सामाजिक चेतना का स्वरूप अहसास का दरिया प्रस्तुत कर अपनी प्रतिभा का अहसास कराया है। उन्होंने अपनी गजलों में समाज की पीढ़ा, भक्ति देश प्रेम, सामाजिक विसंगतियां, महंगाई भ्रष्टाचार और गिरते मानव मूल्यों को उकेरा है। 78 गजलों के इस संग्रह में उन्होंने सत्प्रेरक बनकर कवि धर्म निभाया है। यह संग्रह उन्होंने अपने युवा पुत्र मुकुल शर्मा को समर्पित कर पिता धर्म का पालन किया है।
कवि ने अपनी एक गजल में देश के हालातों पर विवशता व्यक्त करते हुए कहा है कि-
गुलशन में गर बहार न आए तो क्या करें
फूलों पर अब निखार न आए तो क्या करें
निराशा के साथ सार्थकता को भी उन्होंने नहीं छोड़ा है। उनकी यह पंक्तियों कुछ ऐसा ही बयां करती हैं-
ये शजर जबसे घनेरा हो गया है
इस पे चिड़ियों का बसेरा हो गया है
अपनी गजलों के माध्यम से जन मानस को दिशा देने में भी वह पीछे नहीं रहे हैं। उन्होंने साफ लब्जों में बेवाक तरीके से अपनी बात रखी है-
अब न परियों की हमें झूठी कहानी चाहिए
जिंदगानी को हकीकत की निशानी चाहिए
व्यवस्था को ललकारते हुए अपनी बात को जारी रखा है और कहा है कि
बनके जो जयचंद अब सौदा करें निज देश का
ऐसे जयचंदों की अब हस्ती मिटानी चाहिए
आज के हालातों पर उन्होंने तीखा प्रहार किया है और अपनी छोटे मीटर की गजल में काफी बड़ी बात कह दी है-
इसां अपना फर्ज निभाना भूल गया
बिना स्वार्थ के आना-जाना भूल गया
कवि सुधाकर आशावादी ने महेश मित्र के गजल संग्रह पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है कि इन गजलों को पढ़कर लगता है कि उनकी कृति अहसास का दरिया, मात्र दरिया नहीं बल्कि अनुभूतियों का समंदर है। मेरठ के साहित्यकार आशुतोष ने अपनी बेवाक टिप्पणी में कहा है कि उनकी गजल में बारीकियों पर अधिक ध्यान न दिया जाए तो सहजता और सरलता के पहलुओं की उन्होंने माला पिरोकर रख दी है।