बदायूं। पूर्व पावरलिफ्टिंग खिलाड़ी राजेश कुुमार उर्फ शानू परिस्थितियों के चलते तमाम मेडल जीतने के बाद भी खेल को अपना कॅरियर नहीं बना पाए और व्यापार की तरफ मुड़ गए। पर, अब वे युवाओं को पावरलिफ्टिंग के गुर सिखाकर उन्हें उनकी मंजिल तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं।
छह सड़का के पास रहने वाले राजेश कुमार उर्फ शानू का इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरणों का व्यापार है। आज वह एक सफल व्यापारी हैं लेकिन कभी वह पावरलिफ्टिंग के खिलाड़ी हुआ करते थे। राजेश ने वर्ष 1998 में सबसे पहले बदायूं स्टेडियम में आयोजित जिला स्तरीय प्रतियोगिता में भाग लिया और गोल्ड मेडल जीता। इसके बाद इसी साल पीलीभीत में आयोजित यूपी स्टेट चैंपियनशिप में कई राज्यों के प्रतिभागियों को पछाड़कर सिल्वर मेडल झटका। 1999 में आगरा में यूपी पावर लिफ्टिंग एसोसिएशन की ओर से आयोजित चैंपियनशिप में 56 किलोग्राम भार वर्ग में सातवां स्थान पाया। इसके बाद वर्ष 2000 में मथुरा में आयोजित प्रतियोगिता में हिस्सा लिया। साल 2001 में हरदोई में आयोजित सेंट्रल जोन उत्तर प्रदेश पावरलिफ्टिंग चैंपियनशिप के 56 किग्रा भारवर्ग में फिर सिल्वर मेडल पाया।
राजेश बताते हैं कि 1998 में स्टेडियम के कोच अरविंद शर्मा से उन्हें काफी कुछ सीखने को मिला लेकिन संसाधनों की कमी, सरकार की खेलों के प्रति उदासीनता के कारण उनका झुकाव व्यापार की ओर हो गया।
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अब स्टेडियम में युवाओं को सिखा रहे पावरलिफ्टिंग के गुर
- राजेश बताते हैं कि पावर लिफ्टिंग में स्क्वॉड, बेंचप्रेस और डेडलिफ्ट होते हैं। स्क्वॉड में वेट लेकर उठते बैठते हैं, जबकि बेंचप्रेस में बेंच पर लेटकर सीने पर रखकर वेट उठाया जाता है। डेडलिफ्ट में जमीन पर खड़े होकर कमर तक वजन उठाना पड़ता है। इसके लिए नियमित अभ्यास के साथ कुछ तकनीकों की भी आवश्यकता होती है। वह नियमित रूप से स्टेडियम जाते हैं। यहां पावरलिफ्टिंग में कुछ करने की चाह रखने वाले कुछ युवा आते हैं, जिन्हें वह निशुल्क इसके गुर सिखाने के साथ-साथ अभ्यास भी कराते हैं।
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खेल के साथ सफल व्यापारी भी हैं राजेश
राजेश के परिवार में उनकी पत्नी, दो बेटियां स्लेस्टी व निधि हैं। स्लेस्टी कक्षा 12 तथा निधि कक्षा 10 की छात्रा हैं। परिवार चलाने के लिए उन्होंने साल 2003 में इलेक्ट्रानिक्स उपकरणों का व्यापार शुरू किया था लेकिन पावरलिफ्टिंग के प्रति उनका जुनून आज भी कम नहीं हुआ है। वह कहते हैं कि भले ही वह परिस्थितियों के चलते इसमें मुकाम हासिल न कर पाए हों लेकिन यदि उनका सिखाया गया कोई युवा इसमें सफलता हासिल करता है तो उन्हें बेहद खुशी होगी।
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‘न संसाधन थे, न प्रोत्साहन...क्या करता’
राजेश कहते हैं कि जब उन्होंने पावरलिफ्टिंग शुरू की थी तो जिले में अरविंद शर्मा स्टेडियम के कोच थे लेकिन उसके बाद कोई कोच ही नहीं मिला। उन्होंने जो सीखा, अपने स्तर से ही सीखा। इसके अलावा यहां न तो संसाधन थे और न ही उन्हें कहीं से किसी प्रकार का प्रोत्साहन मिल सका। शादी के बाद परिवार की जिम्मेदारियां बढ़ीं तो जीविकोपार्जन की खातिर व्यापार की तरफ रुख कर लिया, लेकिन आज भी पावरलिफ्टिंग के प्रति प्यार खत्म नहीं हुआ है, सो दूसरों को सिखाकर अपना शौक पूरा कर रहे हैं।