सड़क हादसे में मृत ड्राइवर जीतराम और दूसरे ट्रक के हेल्पर पन्नालाल के शव की दुर्दशा देख दवा लेने पहुंचे तमाम मरीज सिहर उठे। खुले आसमान के नीचे तेज धूप में पड़े दोनों के शव पुलिस और सेहत महकमा के कर्मचारियों की बेरहमी की दास्तां बयां कर रहे थे। यह गनीमत रही जो तेज हवा के झोंकों ने उन्हें बख्श दिया, वरना तो चपरासी के रहम पर पड़ा कफन भी उड़ जाता।
पुलिसकर्मियों ने दुर्घटना स्थल से लाकर ड्राइवर जीतराम और हेल्पर पन्नालाल के शव अस्पताल परिसर में लाकर रख दिए। यह सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र परिसर का हिस्सा जरूर था, लेकिन वहां एंबुलेंस खड़ी होती है। अस्पताल चपरासी ने बेड से दो चादर उतारकर शवों के ऊपर डाल दीं। सुबह आठ बजे से लेकर चार बजे तक दोनों शव तेज धूप में पड़े रहे। दोपहर बाद एक महिला के विरोध पर अस्पताल कर्मियों ने इमरजेंसी वार्ड के पास छांव में शवों को ले जाकर रखा, लेकिन घंटाभर बाद फिर धूप पड़ने लगी। चिकित्साधीक्षक विश्वास कुमार अग्रवाल ने बताया कि मोर्चरी नहीं होने की वजह से पुलिस कर्मियों को शव रखने से मना किया था, लेकिन वह नहीं माने। इधर, पुलिस की मानें तो वह तो पेड़ के नीचे शव रखना चाहते थे। अस्पताल कर्मियों ने ऐसा नहीं करने दिया।
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कुदरत को तो यही था मंजूर
उझानी। सितारगंज से बिस्कुट लोड करके हेल्पर पन्नालाल के साथ चले ड्राइवर रामहेत भले ही रिश्ते में एक-दूसरे के कुछ नहीं लगते, लेकिन आपस में लगाव ज्यादा था। दोनों हंसी-खुशी निकले थे। हादसे की सूचना के बाद आगरा से पहुंचे ट्रक मालिक अरुण चौहान ने बताया कि दुर्घटना के बाद रामहेत ने उसे कॉल की। वह पन्नालाल के बारे में कुछ नहीं कह पाया और सिसकने लगा था।