किशोरी को उठा कर ले जाना और उसके साथ थाने में चार घंटे गैंगरेप की घटना में पुलिस दिन भर लीपापोती में जुटी रही। आरोप मूसाझाग थाने के दो सिपाहियों पर है। पूरे मामले में पुलिस ने जो रवैया अपनाया है वह पुलिस का निकम्मापन दर्शाता है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को पूरी तरह से ताक में रख दिया गया। जाहिर है कि किशोरी का मेडिकल परीक्षण में हो रही देरी से आरोपी सिपाहियों को लाभ पहुंचेगा।
पीड़िता अपने परिवार के साथ गुरुवार को अधिकारियों के चक्कर काटती रही लेकिन उसकी रिपोर्ट दर्ज नहीं हो सकी। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश, पाक्सो एक्ट और ऐसी घटनाओं की जांच के लिए आठ जुलाई 2013 को लागू ‘दंड विधि (संशोधन) अधिनियम 2013’ नियमों की कसौटी पर देखें तो इस मामले में पुलिस का निकम्मापन जाहिर होता है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश हैं कि ऐसे अपराध की सूचना मिलने पर थाने का ड्यूटी आफीसर तत्काल महिला पुलिस अधिकारी को बुलाएंगे। महिला पुलिस अधिकारी पीड़िता और उसके परिवार को सांत्वना देगी। इसके बाद पीड़िता को पैरा लीगल वालंटियर भी पुलिस को ही मुहैया कराना होगा। इस तरह के अपराध का मुकदमा आईपीसी की संशोधित धाराओं के तहत महिला पुलिस अधिकारी ही दर्ज करेंगी और इसकी वीडियोग्राफी कराई जाएगी।
गौर करने वाली बात यह है कि इस मामले में पुलिस ने पीड़िता, उसके परिवार को सांत्वना देना तो दूर मुकदमा तक दर्ज नहीं किया। आईपीसी की धारा 164 के तहत पीड़िता का बयान न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज कराया जाना चाहिए। इस मामले में पाक्सो एक्ट के किसी भी नियम और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को पुलिस ने पूरी तरह से ताक में रख दिया है। चौबीस घंटे के बाद भी न तो मामले में रिपोर्ट दर्ज हुई और न पीड़िता का मेडिकल कराया गया। पुलिस लीपापोती कर मेडिकल में देरी कराकर अपने सिपाहियों को बचाने में जुटी हुई है।