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पुरुषों के मुकाबले परिवार नियोजन को ज्यादा तबज्जो दे रहीं महिलाएं

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बदायूं। कोरोना के बीच विश्व जनसंख्या दिवस शनिवार को चुपके से निकल गया। न कोई शोर शराबा, न कोई कार्यक्रम और न ही कोई बयानबाजी। हर साल इस दिवस पर कार्यक्रमों की बाढ़ सी आ जाती थी। भले ही देश और प्रदेश की स्थिति जनसंख्या के मामले में लगातार विस्फोटक होती जा रही है लेकिन इन सबके बीच एक राहत देने वाली खबर भी है। अब शहर से लेकर गांव-देहात तक लोगों में परिवार नियोजन के प्रति जागरूकता बढ़ रही है। छोटा परिवार, सुखी परिवार जैसे स्लोगन अब सिर्फ दीवारों की शोभा नहीं बढ़ा रहे बल्कि लोगों को जागरूक करने का काम भी करने लगे हैं। वैसे तो महिलाएं परिवार नियोजन के मामले में पुरुषों से काफी आगे हैं लेकिन अब पुरुष भी परिवार नियोजन के नसबंदी जैसे तरीकों को अपनाने में गुरेज नहीं कर रहे।
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जिले की बात करें तो यहां महिलाओं की तुलना में पुरुष नसबंदी का आंकड़ा दस फीसदी भी नहीं है लेकिन पिछले पांच सालों से पुरुष नसबंदी की संख्या में इजाफा हो रहा है। हालांकि, महिलाओं के मुकाबले यह फिर भी नाकाफी है। परिवार नियोजन के साधन अपनाने में महिलाओं की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। 2015 में पुरुष नसबंदी के लिए 2,110 लोगों का लक्ष्य मिला लेकिन जिले में सिर्फ 72 पुरुषों ने ही नसबंदी कराई। वर्ष 2020 में पुरुष नसबंदी का आंकड़ा बढ़कर 198 हो गया। महिलाओं की बात करें तो 2015 में 8004 और 2020 में 9920 महिलाओं ने नसबंदी कराई।
नसबंदी पर प्रोत्साहन राशि की व्यवस्था
परिवार नियोजन के लिए सरकार कई योजनाएं चला रही है। नसबंदी कार्यक्रम में तहत प्रोत्साहन राशि देने की व्यवस्था है। नसबंदी कराने पर महिला को दो हजार रुपये और पुरुषों को तीन हजार रुपये दिए जाते हैं। अगर नसबंदी का कोई मामला फेल हो जाता है और नसबंदी होने के बाद भी कोई महिला गर्भवती हो जाती है तो उसे मुआवजा देने का भी प्रावधान है।
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क्या कहते हैं अधिकारी
उच्च शिक्षित लोग परिवार नियोजन के प्रति ज्यादा गंभीर रहते थे लेकिन अब कम शिक्षित भी इसे समझते हुए सावधानियां अपना रहे हैं। इनकी संख्या तेजी से बढ़ी है। सीमित परिवार से महिला की सेहत ठीक रहती है। बच्चों की परवरिश भी बेहतर की जा सकती है। छोटे परिवार का महत्व अब लोग समझने लगे हैं। - अरविंद राना, डीसीपीएम, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन
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