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..तो क्या गोशालाओं के नाम पर भी हो रहा घपला

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बदायूं। कछला में 22 गोवंशीय पशुओं की मौत के बाद जो तस्वीर उभरकर सामने आ रही है, वह गोशाला व्यवस्थापकों पर सीधे तौर पर सवाल खड़े कर रही है। दरअसल कछला में जिस गोशाला में ये गोवंश थे, उनकी गणना में यह बात सामने आयी कि कई टैग लगे गोवंश लावारिस रूप से सड़कों पर घूमकर अपना पेट भर रहे थे। शहर भी इससे अछूता नहीं है। यहां पर भी टैग लगे गोवंशीय पशु सड़कों पर घूमते अक्सर दिखाई दे जाते हैं, जबकि शासन की ओर से चारे के लिए 30 रुपये प्रतिदिन/ प्रति गोवंश दिया जा रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है जब ये गोवंश लावारिस घूम कर अपना पेट भर रहे हैं, तो शासन से मिलने वाली धनराशि किसके पेट में जा रही हैं।
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सूबे की योगी सरकार ने सत्ता में आते ही सड़क को घूमने वाले गोवंश के लिए हर जगह गोशालाओं को खोलने का फरमान जारी किया था, साथ ही सभी जिलाधिकारियों को शासन के आदेश को कड़ाई से पालन करने के निर्देश दिए थे कि कोई भी गोवंश खुले रूप में न मिले। शासन की ओर से गोवंश के चारे के लिए बजट व्यवस्था की गई। निकायों और ग्राम पंचायतों को धनराशि भी दी गई। इस बात के भी निर्देश थे कि ग्राम पंचायतों में जो भी जमीन खाली पड़ी है, उस जमीन पर गोवंश के लिए चारे की व्यवस्था की जाए। शासन के निर्देश के बाद सभी स्थानों पर स्थायी और अस्थायी गोशालाएं खोली गई। शासन ने प्रति गोवंश के चारे के लिए 30 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से गोशाला संचालकों को बजट दिया।
दो दिन पहले कछला मेें 22 गोवंश की एक साथ मौत हो जाने के मामले ने जिला प्रशासन के साथ ही शासन को हिलाकर रख दिया। मौके पर जब जांच की गई थी तो गोशाला में 76 में 70 गोवंश मिले थे, बाकी कछला की सड़कों पर लावारिस घूम रहे थे। कुछ अधिकारियों ने इस बात पर संचालकों के प्रति नाराजगी भी जताई। कहा था कि जब प्रति गोवंश चारे के लिए बजट दिया जा रहा है, तब सड़कों पर इन गोवंश को क्यों छोड़ जा रहा है। निश्चित तौर पर ये किसी घपले की ओर से इशारा कर रहा है। इसके पीछे यह भी हो सकता है कि गोशालाओं में गोवंशीय पशुओं की संख्या में हेरफेर करके आने वाले बजट का बंदरबांट किया जा रहा हो।
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ये कमेटी करती है बजट को पास
किसी गोशाला में कितने गोवंश हैं, उनकी संख्या के हिसाब से उस गोशाला के संचालक को बजट दिया जाता है। इसका निर्धारण करने के लिए प्रधान, सचिव, बीडीओ, पशुधन प्रसार अधिकारी, पशु चिकित्सक और गांव के तीन लोगों की टीम होती है।

प्रधान, सचिव, डॉक्टर समेत आठ लोगों की टीम निर्धारित करती है कि किस गोशाला को कितनी धनराशि दी जानी है। उसकी के हिसाब से धनराशि अवमुक्त की जाती है। रही बात टैग लगे गोवंश की तो जो पशु गोशालाओं से बाहर मिले हैं, उनकी जांच जाएगी, उसके बाद में ही कुछ कहना संभव हो सकेगा।
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-डॉ. एके जादौन, सीवीओ
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