बदायूं। सोत सूखी तो सबसे ज्यादा कब्जे शहर में स्थित लालपुल क्षेत्र में हुए। सपा सरकार के दौरान किसी ने मैरिज लॉन बनाया तो किसी ने व्यावसायिक भवन बनाकर कब्जा कर लिया। एक व्यक्ति ने तो यहां सोत की छाती पर ही स्वीमिंग पूल भी बना लिया वह भी एक नहीं दो-दो। अब यहीं उसके आसपास के क्षेत्र में प्लॉटिंग कराई जा रही है। ऐसे में सोत को पुनर्जीवित करना तो बाद की बात है, भूमाफिया के चंगुल से जमीन को बचाना ही प्रशासन के लिए चुनौती है। हालांकि प्रशासन एक के बाद एक करके इन भूमाफिया की बिल्डिंग को ध्वस्त कर रहा है, अब देखना ये है कि स्वीमिंग पूल पर उसकी बुल्डोजर कब गरजती है।
जिले में बिसौली से प्रवेश करने वाली सोत नदी बिल्सी तहसील से होकर बदायूं की सीमा में प्रवेश करती है। यहां यह कभी लाल पुल क्षेत्र से होकर निकलती थी, जिस पर पुल भी बना हुआ है। कभी इस नदी में अच्छा खासा पानी हुआ करता था, लेकिन जैसे-जैसे नदी सूखी वैसे वैसे भूमाफिया की नजर इस पर पड़ती चली गई। कुछ लोगों ने इसके आसपास खेती करनी शुरू कर दी तो किसी ने जमीन को जोत लिया। समय के साथ साथ इस पर कब्जे भी होना शुरू हो गए। सपा सरकार में तो यहां मैरिज लॉन और व्यावसायिक भवन तक बना लिए गए। इसी बीच पुल के नीचे ढलान से होकर कबूलपुरा जाने वाले रोड के बायीं तरफ स्वीमिंग पूल का भी निर्माण कर लिया गया। वह भी एक नहीं दो-दो, जिनमें बाकायदा बुकिंग की जाने लगी। बताते हैं कि ये स्वीमिंग पूल नदी पर अतिक्रमण करके बनाए गए हैं। यही नहीं, यहां आसपास के क्षेत्र में एक व्यक्ति द्वारा प्लाटिंग भी कराई जा रही है।
प्रशासन ने पिछले दिनों पूर्व दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री आबिद रजा का मैरिज लॉन ध्वस्त कराया था। इसके बाद एक व्यावसायिक भवन तोड़ा गया। पिछले दिनों एसएस लॉन पर जेसीबी चलवा दी गई। बताते हैं कि अब प्रशासन की नजर स्वीमिंग पुलों पर है। माना जा रहा है कि कुछ दिनों में इनके ध्वस्तीकरण की भी कार्रवाई हो सकती है।
सोत नदी पर कुछ जगहों पर कब्जे की शिकायतें मिली थीं। इनकी जांच कराई गई, तो वह सही पायी गईं, जिसके बाद में उच्चाधिकारियों के निर्देश पर उन जगहों पर कब्जा हटवाया गया। नदी पर किसी को कहीं पर भी कब्जा नहीं करने दिया जाएगा। नदी की जमीन पर स्वीमिंग पूल बने होने की बात भी पता चली है। इसकी जांच चल रही है, जांच पूरी होने के बाद में रिपोर्ट उच्चाधिकारियों को सौंपी जाएगी। उसके बाद में जो भी निर्देश मिलेंगे, उसके अनुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी।
-केके अवस्थी, सिटी मजिस्ट्रेट
अपने प्राकृतिक जलस्रोतों के कारण नाम पड़ा सोत
बदायूं। सोत नदी का नाम ऐसे ही सोत नहीं पड़ा। बताते हैं कि इस नदी में अपने जलस्रोत थे, जिनसे स्वत: ही पानी निकलता रहता था। इन्हीं स्रोतों के कारण इसका नाम सोत नदी पड़ा। मुरादाबाद मंडल के अमरोहा जिले के पास से निकलने वाली यह नदी बिसौली से जिले में प्रवेश करती है जो जखौरा, भगवतपुर, फतेहपुर वीरमपुर, सुजानपुर, परौली, रोटा नगरिया, सोई आदि गांवों से होते हुए बिल्सी क्षेत्र के गांव रुपपुरा में आती है। यहां से मूसैपुर, जिनौरा, शहजादनगर खेड़ा आदि गांवों में होती हुई शहर की सीमा में स्थित लालपुर में पहुंचती है। यहां से नौशेरा, उपरैरा होते हुए मूलखेड़ा, बरौनिया, खेड़ा जलालपुर पुख्ता, पृथ्वीनगला, गढ़ियाहरदोपट्टी होते हुए न्योली फतुआबाद आती है और इसके बाद शाहजहांपुर में प्रवेश कर जाती है। इस नदी का इतिहास काफी पुराना है। कुल 220 किमी में बहने वाली इस नदी का 105 किमी का हिस्सा बदायूं जनपद में लगता है। अंत में जाकर यह गंगा नदी में मिल जाती है। ब्यूरो
सोत सूखी तो वाटर लेबल भी चला गया नीचे
उसहैत (बदायूं)। सोत नदी जब पानी से लबालब थी तो किसान सिंचाई के लिए परेशान नहीं होते थे, लेकिन धीरे-धीरे जैसे नदी सूखी वैसे वैसे हालत बिगड़ते गए। उसहैत के अधिकतर किसान सिंचाई के लिए सोत पर ही निर्भर थे, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। उन्हें सिंचाई के लिए बोरिंग करानी पड़ रही है, लेेकिन वाटर लेबल काफी नीचे जाने पर अब यह काफी महंगी पड़ रहा है। किसानों का कहना है कि यदि सोत के पुनर्जीवन के लिए प्रयास हों तो उन्हें काफी राहत महसूस हो सकती है।
क्षेत्र के बुजुर्ग ग्रामीण बताते हैं कि कोई समय था जब यहां सोत नदी में लबालब पानी हुआ करता था। इलाकों के किसान सोत नदी में पाइप डालकर पंपिंग सेट लगाकर कम खर्चे पर फसलों की सिंचाई कर लेते थे, लेकिन अब किसानों के सामने सिंचाई के लिए पानी बहुत बड़ी समस्या बन गई है। संपन्न लोग तो खेतों में सरकारी या निजी ट्यूवबेल लगाकर सिंचाई कर लेते हैं, परन्तु अधिकतर लोग इसे भगवान भरोसे ही छोड़ देते हैं, जबकि नदी रहते हुए यही किसान बेफिक्र रहा करते थे। अब आर्थिक रूप से कमजोर ग्रामीण किसी तरह सिंचाई को यदि बोरिंग करा भी लेते हैं तो वे बीज या खाद को महंगे ब्याज रेट पर साहूकारों से पैसा लेते हैं। गांव गरिया हरदोपट्टी के ग्रामीणों का कहना है कि नदी किनारे की फसलों को सिंचाई के साधन ग्रामीण अब तक नहीं कर पाये हैं। बताते हैैं कि परिवार का पालन पोषण ही जैसे-तैसे कर पाते हैं। सिंचाई के साधनों का इंतजाम करना मुमकिन नहीं हो पाता है। सरकार ने कभी जानने का प्रयास नहीं किया, जबकि जनप्रतिनिधियों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह सोत नदी के संबंध में शासन के सामने पक्ष रखें। इस संबंध में ग्रामीण लोगों में जागरूकता लाने के लिए अमर उजाला द्वारा निरंतर चलाए जा रहे अभियान की सराहना कर रहे हैं।
सोत नदी में जब से पानी नहीं है तब से वाटर लेबल काफी नीचे चला गया है, इस कारण किसान यदि सिंचाई के लिए बोरिंग भी कराता है तो वह बहुत महंगा पड़ता है।
-अमरपाल सिंह, गरिया हरदोपट्टी
जब सोत नदी में पानी था तब पशुओं को नदी के पानी में छोड़ देते थे और पशुओं को पानी पीने के साथ राहत मिलती थी। अब तो पशुओं को पानी पिलाने की ही समस्या हो गई है।
- राजेशपाल, गरिया हरदोपट्टी
सरकार को अनेक जिलों से होकर गुजरने वाली सोत नदी के स्रोत खुलवाने के प्रयास करने चाहिए, जिससे पशुओं के साथ अनेक ग्रामों के लोगों को पुन: राहत मिल सके।
- अजयपाल सिंह, गरिया हरदोपट्टी
अमर उजाला की पहल सराहनीय है। सरकार को सोत नदी को पुनर्जीवित करने प्रयास के करने के प्रयास करने चाहिए, ताकि किसानों को राहत मिले सके।
- हरीश बाबू, पूर्व प्रधान गरिया हरदोपट्टी