बदायूं। मोबाइल और टैबलेट के बढ़ते उपयोग ने बच्चों की दुनिया को तेजी से बदल दिया है। आज की पीढ़ी के बच्चे घंटों कार्टून और एनिमेशन में खोए रहते हैं, इसका सीधा असर उनके मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास पर पड़ रहा है। अत्यधिक स्क्रीन देखने की यह आदत बच्चों में एक नई समस्या को जन्म दे रही है, जिसे ‘वर्चुअल ऑटिज्म’ कहा जा रहा है। यह वास्तविक ऑटिज्म नहीं है, बल्कि लंबे समय तक स्क्रीन-एक्सपोजर के कारण उत्पन्न होने वाली स्थिति है।
जिला अस्पताल में तैनात क्लीनिकल साइक्लोजिस्ट सर्वेश कुमारी का कहना है कि सप्ताह में तीन से चार मरीज आ रहे हैं। कई मामलों में बच्चे अकेले रहना पसंद करने लगते हैं, परिवार के सदस्यों से बातचीत में रुचि नहीं दिखाते और नाम पुकारने पर भी प्रतिक्रिया नहीं देते। यह व्यवहार माता-पिता के लिए चिंता का कारण बन रहा है। जिला अस्पताल में तैनात बाल रोग विशेषज्ञ कप्तान सिंह बताते हैं कि छोटे बच्चों का दिमाग बहुत संवेदनशील होता है।
इस उम्र में उन्हें सामाजिक संपर्क, बातचीत, खेलकूद और भावनात्मक जुड़ाव की आवश्यकता होती है। जब बच्चा अधिकांश समय स्क्रीन के सामने बिताता है, तो उसका मस्तिष्क वास्तविक अनुभवों से वंचित रह जाता है। इससे भाषा विकास में देरी, ध्यान की कमी, चिड़चिड़ापन और सामाजिक कौशल कमजोर होने जैसी समस्याएं सामने आती हैं।
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वास्तविक दुनिया से अलग हो जाते हैं बच्चे
क्लीनिकल साइक्लोजिस्ट सर्वेश कुमारी का कहना है कि ‘वर्चुअल ऑटिज्म’ होने पर कार्टून देखने वाले बच्चे कैरेक्टर की भाषा, आवाज और हाव-भाव की नकल करने लगते हैं। वे वास्तविक दुनिया से कटने लगते हैं और अपने आसपास के लोगों से संवाद कम कर देते हैं।
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शांत कराने के लिए दे देते है टैबलेट
-माता-पिता अक्सर बच्चों को व्यस्त रखने या शांत कराने के लिए मोबाइल या टैबलेट थमा देते हैं, लेकिन यह आदत धीरे-धीरे लत में बदल जाती है। डाॅक्टराें का मानना है कि दो से पांच वर्ष की आयु के बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम बेहद सीमित होना चाहिए। इसके स्थान पर बच्चों को कहानी सुनाना, उनसे बातचीत करना, बाहर खेलना और रचनात्मक गतिविधियों में शामिल करना ज्यादा लाभकारी है। वर्चुअल ऑटिज्म की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि समय रहते स्क्रीन टाइम कम करने और बच्चे को सामाजिक वातावरण देने से स्थिति में सुधार संभव है।