बदायूं। एक ओर घरेलू गैस और बिजली की बढ़ती लागत ने आमजन की जेब पर असर डाला है, तो वहीं दूसरी ओर बायोगैस जैसे सस्ते और पर्यावरण अनुकूल विकल्प की ओर लोगों का रुझान तेजी से बढ़ रहा है। बावजूद इसके कछला और मलिकपुर में स्थापित बायोगैस प्लांट पूरी तरह से उपयोग में नहीं आ पा रहे हैं, जिससे योजनाओं का अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा।
जिले में 238 गोशालाओं में करीब 22 हजार मवेशी संरक्षित हैं। इन्हीं गोशालाओं से निकलने वाले गोबर का उपयोग कर बायोगैस उत्पादन की व्यापक योजना बनाई गई है। यदि यह योजना धरातल पर पूरी तरह लागू होती है, तो न केवल स्वच्छ ऊर्जा का उत्पादन होगा बल्कि गोशालाओं के संचालन में भी आर्थिक मदद मिलेगी।
कैसे बढ़ा बायोगैस की ओर रुझान
विशेषज्ञों के अनुसार, एलपीजी सिलिंडर और बिजली के बढ़ते खर्च के कारण ग्रामीण और अर्धशहरी क्षेत्रों में लोग वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की तलाश कर रहे हैं। ऐसे में बायोगैस एक सस्ता, टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल विकल्प बनकर उभर रहा है। पशुपालन करने वाले परिवार विशेष रूप से इस ओर आकर्षित हो रहे हैं।
कम खर्च में अधिक फायदा
बायोगैस प्लांट स्थापित करने में शुरुआती लागत जरूर आती है, लेकिन एक बार सेटअप होने के बाद यह लंबे समय तक कम खर्च में गैस उपलब्ध कराता है। गोबर और जैविक अपशिष्ट से तैयार होने वाली गैस का उपयोग खाना बनाने, लाइट जलाने और छोटे मोटर चलाने तक में किया जा सकता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ता प्रयोग
जिले के कुछ गांवों में लोग पिछले कई वर्षों से छोटे स्तर पर बायोगैस प्लांट का उपयोग कर रहे हैं। इनका कहना है कि इससे एलपीजी पर होने वाला खर्च काफी हद तक कम हो गया है। साथ ही, गोबर के निस्तारण की समस्या भी हल हो जाती है और बचा हुआ स्लरी खेतों के लिए जैविक खाद के रूप में उपयोगी साबित होता है।
संभावनाएं और चुनौतियां
विशेषज्ञ मानते हैं कि जिले में हजारों परिवार ऐसे हैं, जो बायोगैस प्लांट लगाने की क्षमता रखते हैं, लेकिन जागरूकता की कमी और शुरुआती लागत के कारण अभी इसका विस्तार सीमित है। यदि सरकार की योजनाएं प्रभावी तरीके से लागू हों और तकनीकी सहयोग मिले, तो बायोगैस उपयोग करने वालों की संख्या में तेजी से वृद्धि हो सकती है।
कैसे करें बायोगैस प्लांट की स्थापना
बायोगैस प्लांट लगाने के लिए पशुओं की उपलब्धता, पर्याप्त स्थान और पानी की जरूरत होती है। तकनीकी मार्गदर्शन के साथ इसे आसानी से स्थापित किया जा सकता है। सरकार द्वारा इस दिशा में सब्सिडी योजनाएं भी चलाई जाती हैं, जिनका लाभ उठाकर किसान और पशुपालक इसे अपना सकते हैं। कुल मिलाकर, बायोगैस बदायूं जैसे कृषि प्रधान जिले के लिए ऊर्जा का एक मजबूत विकल्प बन सकता है।
जिले में दो गोशालाओं में बायोगैस प्लांट बने हैं, लेकिन वह दोनों अधूरी अवस्था में हैं। ठेकेदारों की ओर से इनका निर्माण पूरा नहीं कराया गया है, जिससे इनका संचालन नहीं हो पा रहा है। - समदर्शी सरोज, मुख्य पशु चिकित्साधिकारी