बदायूं। विधानसभा चुनाव में प्रत्याशियों की जीत हार के साथ आज उनकी पार्टियों में बड़े नेताओं का कद भी तय होगा। भाजपा में केंद्रीय सहकारिता राज्यमंत्री बीएल वर्मा व सपा में पूर्व सांसद धर्मेंद्र यादव ने टिकट तय करने से लेकर प्रचार व अन्य मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। प्रत्याशियों की जीत व हार से इन दिग्गजों के सियासी कद पर भी असर पड़ेगा। जिले की सांसद संघमित्रा केवल नामांकन व मतदान के दिन नजर आईं। सोशल मीडिया से तीखे वार कर रहीं सांसद का भविष्य भी इस चुनाव परिणाम से तय होगा तो चुनाव के वक्त खामोश या अति सक्रिय रहे कई पूर्व विधायकों का भविष्य भी चुनाव परिणाम से प्रभावित होने का अनुमान है।
-
केवल नामांकन में दिखीं सांसद संघमित्रा, भाजपा से बनाए रखी दूरी
सांसद डॉ. संघमित्रा मौर्य पिछले दिनों काफी चर्चा में रहीं। जिले में जहां राष्ट्रीय स्तर के भाजपा नेता व गृहमंत्री तक कार्यक्रम कर गए वहीं उनकी मौजूदगी नगण्य सी रही। वह एक दिन राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के कार्यक्रम में पहुंचीं। इस बीच उनके पिता स्वामी प्रसाद मौर्य ने भाजपा छोड़कर सपा ज्वाइन कर ली तो संघमित्रा के तीखे बोल सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुए। फिर वह केवल नामांकन के दिन यहां आई थीं और भाजपा प्रत्याशियों की जीत का दावा किया। इसके बाद पूरे चुनाव वह प्रचार में नहीं आईं। कुछ दिनों पहले पिता के निर्वाचन क्षेत्र में उनला लाठी लेकर विरोधियों को खदेड़ते वीडियो वायरल हुआ। सांसद ने भाजपा प्रत्याशी के साथ ही पार्टी के प्रांतीय नेतृत्व पर तीखे प्रहार किए। बदायूं के नेताओं को भी इशारे में लपेटा। हालांकि केंद्रीय नेतृत्व व प्रधानमंत्री के प्रति उन्होंने आस्था जताई। माना जा रहा है कि भाजपा के चुनाव जीतने पर संघमित्रा की भूमिका को लेकर समीक्षा हो सकती हैं।
-
केंद्रीय राज्यमंत्री बीएल वर्मा ने निभाई जिम्मेदारी
भाजपा में कार्यकर्ता से केंद्रीय राज्यमंत्री का सफर तय करने वाले बीएल वर्मा संगठन की राजनीति के बड़े खिलाड़ी माने जाते हैं। इस चुनाव में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। वह पार्टी के स्टार प्रचारकों की सूची में शामिल रहे हैं। केंद्रीय मंत्री अमित शाह हों या सीएम योगी, सभी ने वर्मा को हेलिकॉप्टर में साथ घुमाकर उनकी उपयोगिता को और महत्वपूर्ण बनाने का काम किया। माना जा रहा है कि लोधे राजपूत व अन्य वर्ग के वोटरों पर उनका प्रभाव है। चुनाव में भाजपा की सीटें ज्यादा निकलीं तो उनका कद बढ़ना तय है।
-
पूर्व सांसद धर्मेंद्र यादव ने बहाया खूब पसीना
जिले के पूर्व सांसद धर्मेंद्र यादव जिले में सपा की राजनीति की धुरी बने हुए हैं। सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव के भाई होने के नाते टिकट वितरण से लेकर अन्य रणनीति बनाने में उनकी भूमिका रही है। सदर सीट पर उनके प्रयास से काजी रिजवान का टिकट तय होने का मामला हो, बाद में हाजी रईस अहमद के टिकट पर मुहर का मामला हो या पूर्व विधायक आबिद रजा की एंट्री को रोकने का, सभी जगह धर्मेंद्र यादव ही प्रभावी रहे। उन्हें कई तरह के आक्षेप का सामना करना पड़ा और कई बार अपनों के ही निशाने पर आए पर इससे बिना विचलित हुए धर्मेंद्र यादव ने पार्टी प्रत्याशियों को जिताने में जान झोंक दी। प्रचार के आखिरी दिन अखिलेश यादव की सभा में उन्होंने नाराज साथियों को एक मंच पर जुटाकर फिर अपनी ताकत दिखाई। चुनाव में सपा को ज्यादा सीटें मिलीं तो धर्मेंद्र यादव की जय जयकार होना तय है।
-
सपा की सीटें कम हुईं तो आबिद बनेंगे सिकंदर
सपा विरोधी मुहिम के अगुवा बने वक्फ विकास निगम के पूर्व चेयरमैन आबिद रजा भी इस चुनाव में अलग भूमिका में दिखे। सपा ने उनका शहर से टिकट काटा तो उन्होंने दूसरे दलों या निर्दलीय लड़ना मुनासिब नहीं समझा और सपा के ही खिलाफ मुहिम छेड़ दी। वह सपा को ‘नई सपा’ बताकर विरोध कर रहे थे। शेखूपुर में उन्होंने खुलकर बसपा प्रत्याशी के पक्ष में सभाएं कीं और खासकर मुस्लिम समाज से नई सपा को वोट न देने की अपील की। जिले में अगर सपा की सीटें मुस्लिम वोटों की कमी से गिरने की स्थिति बनी तो आबिद फैक्टर माना जा सकता है। वैसे आबिद रजा ने पूरे चुनाव प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में सभाएं करके सपा के खिलाफ मोर्चा खोला है। संवाद